दिनेश चारण की कविताएं
 

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मैं कविता पढ़ना चाहता हूँ
कडबी काटते हुए
धूप के साये में
पसीने की गंध के साथ
मिट्टी की महक में
ताकि बस जाये कविता
लोक के कंठ में
उन गीतों की तरह
जो पीढ़ियों की परम्परा
संजोये हुए
आज भी अमर है
बिना अपने रचयिता के नाम के।


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औरतें खपा देती है अपनी जिन्दगी
बर्तनों का मुलम्मा छुड़ाने में
घर को घर बनाने में
आँगन को बुहारने में
निपटा देती है अपनी जिन्दगी
घरेलू कामों को निपटाने में
जैसे बजती है मंदिरों में सुबह शाम घंटियाँ
वैसे ही बजते है बर्तन रसोइयों में
क्योंकि औरतें व्यस्त है
अपनी पूजा में...!


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दुनिया की सारी कलाएं झूठी है,
खेतों में धान और चारा निपजाना
एकमात्र सच्ची कला है
जो पालती है पेट
जो देती है जीवन।
 

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सुबह उठकर पक्षियों को चुग्गा डालना
अपनी रोटी से पहले कुत्तों के लिए रोटी निकालना
प्याऊ में पानी भरना ताकि कोई अंजान राहगीर
प्यासा ना रहे
माँगने आये उसे खाली नही भेजना
यह धर्म और शास्त्र का डर नही है
यह संस्कृति है मेरे गाँव की
यह प्रेम है मेरे गाँव का
जिसके बदले कुछ नही चाहिए।
 

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खेतों में खरपतवार निकालते हुए
उसकी उम्मीद थी बस इतनी कि‍
विधाता देना इतना कि
पेट पाल सकूँ परिवार का
बरसना इतना कि
फसल की अकाल मौत न हो
जिससे न हो मेरी अकाल मौत।
फसल की अकाल मौत नही है
मात्र फसल की अकाल मौत
यह है एक उम्मीद की अकाल मौत
यह है एक समय की अकाल मौत ।


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देह से दूरी
दूरी नही होती
मन से दूरी
होती है दूरी
जिसके मध्य होता है
कभी न पाटने वाला समय। 
विकलताओं के मध्य
एक कल्पवृक्ष की आस
बँधी होती है
जो मिटाती है काल की दूरियां
भरती है शून्यता
मिटाती है अंधेरा ।
भावों की प्रवणता
भरती है उजाला
एक आबाद जहां का।

 


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