मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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बालामणीयम्मा की कविताओं के साथ ही उनकी पुत्री कमला दास के उपन्यास नीर्मादल पूत्तकालम का भी अनुवाद किया। कमलादास की कविताए तो पढ़ी जाती ही हैं। लेकिन उनके इस आत्मकथ्यात्मक उपन्यास ने उनकी अपनी गाथा के साथ मां और नाना के इतिहास को भी दर्शाया था। बालामणियम्मा की छोटी बेटी से हुई बातचीत ने अम्मा को समझने में भी मदद की थी। मै बालामणियम्मा को देख कर अचम्भित थी कि कितनी सहज, लेकिन कितनी गूढ़। लेकिन जब कविताओं का अनुवाद किया तो महसूस हुआ कि जिन्दगी का कोई भी हिस्सा नहीं था, जिसे उन्होंने छुआ नहीं था, जबकि उन्होंने पारम्परिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, और घर से बाहर भी नहीं निकली थीं, लेकिन उनकी कविताओं नक्सल समस्या, रेगिंग समस्या, सर्जरी और पोस्टमार्टन आदि से सम्बन्धित कविताए भी करी ६० या ७० के दशक में लिख ली थी? साथ ही वे पौराणिक कथाओं को बेहद आधुनिक दृष्टि से प्रस्तुत करती थीं। जैसे कि कुब्जा कुबड़ी नहीं, बल्कि समाज में हीन समझी जाने वाली स्त्री थी, जिसे कृष्ण से सिर उठा कर जीना सिखाया, वाल्मीकि को क्रोंच पक्षी के वध से ज्याद इस बात की ग्लानी थी कि वे अपने परिवार को जंगल में अहसाय छोड़ आये, परिवार को वे कैसेभी पालते, वह उनकी जिम्मेवारी थी।

रति सक्सेना
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प्राचीन राजधानी, खोरखोरम
शरद रितु की बारिश से ज्यादा
नक्काशीदार पत्थर और हरिताश्म से ज्यादा
तुमने थाम रखी हैं. मेरे जिंदगी की सुप्त भावनाओं को
हादा सेंडू (Hadaa Sendoo)
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शायद
जब खोने लगता है
वो भरोसा जिसके तहद
कोई रिश्ता
मरुथल-सी प्रेम धरा पर
अंकुरित हो, पल्लवित होता है...
प्रगति गुप्ता
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हम उठते हैं
फिर बैठ जाते हैं
रास्ता ।
आगे जो फैला है ।
इंतज़ार ही करता रहता है
दफ़ैरून 
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बुनियादों में नहीं
रखी जाती
बेटियों की नाल
घरों को
नहीं रहता इंतज़ार
बेटियों के
लौट आने का
तृप्ति
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धूप से सनी हुई दोपहर
मेरे पसीने से अपना चेहरा धोती है
और पसीने के नमक से उसका चेहरा
दमक उठता है
अपने दमकते चेहरे पर एक लाल टीका लगाते हुए
ओढ़ लेती है शाम का आँचल
उस आँचल में सितारों से होती है
जरदोजी की कढ़ाई
अनामिका चक्रवर्ती
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लाईब्रेरी में
बहुत पहले रखी हुई किताब
जो
सिर्फ़ दीमकों का खाद्य बनी
और मैं
गाँव का
वर्षों पहले सूख चुका कुआँ
जो है
विषैले सरीसृपों का आवास
और मैं
कैलाश मनहर
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मोहन राणा वे युवा कवि है जो कविता के बेहद करीब और देश से काफी दूर रहते हैं, मोहन राणा की कविताए सुखद अनुभव हैं क्यों कि ये बिम्बों के उलझाव के बिना सार्थक हैं नारों से दूर रहते हुए चेतना से जुड़ीं हैं। मोहन की कविताएं अपने समय से जुड़ी होकर भी विषयवस्तु में अलग हैँ।

अनिकेत

बरस कितने बीते यहाँ इधर
वहाँ वे कहते फिर सुनाते कहानी
याद जिसे कभी करते जब तब
हम आपको याद करते हैं मैं सुनकर जैसे भूलता
धमनियों में बहते वर्तमान के तनाव को,
वे कठिन दिन अब दवा की तरह काम करते हैं ;
घर की रंगाई पुताई हो रही है बदले मौसम
और यह बाज़ार में ब्रिकी के लिये टंगा होगा
प्रोपट्री डीलर की खिड़की पर विश्वास की बाज़ार कीमत पर

रोवन के पेड़ पर झींसी बारिश में रॉबिन बोलती
चुपचाप अपनी गाँठें खोल रहा है वसंत अभी,
अंतःकरण में विगत यात्राओं से
जाने क्या खोल रख देगा वह अपनी गठरी से कोंपलों के साथ

कवि पार चला जाता है...
उपनिषद कहते हैं - सीमा पार करता है कवि

अब कौन सी सीमा यह
शब्द की सीमा
प्रेम की सीमा
भय की सीमा
मौन की सीमा
पार कर
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शूरौक हम्मूद (shurouk hammoud)
अनुवाद ‍ उमा

मैं यहाँ नहीं हूँ
मैं नहीं सुन पा रही तुम्हें
कुछ शोर बिसराया जा चुका था अंतस की पुकार का
मुझे दिखाई दिए रात के स्याह पटल पर
खंजर, जो कि अब प्रेमियों के गर्दनों पर धंसे हुए थे
रात के ताबूत ने तैयार की इंतज़ार की धुन,
सैनिकों के जूते, जो कि खो चुके थे अपने मालिकों को,
खालीपन बोझ बन चुका है,
समंदर है कि उनकी प्रार्थनाओं को उगल रहे
जो कि अपनी जि़ंदगी की राह में मर चुके थे,
गीत जो कि चल दिए मृतकों के पीछे,
आसमान जो कि कसकर बंद कर रहे भोर के कान,
घर जिनके कि नाम बदले जा चुके हैं,
ध्वजा जिनके कि रंग खराब हो चुके हैं
और कच्ची दीवारें जिनकी रेत इन आवाज़ों के शोर से दूर भागती है...
जागृति का व्याख्यान है
पर कोई नहीं बचा उसे बांचने के लिए
इसलिए मेहरबानी होगी, मेरी चुप्पी को मत खरोंचो
मैं तुम्हारे साथ नहीं
कुछ कब्रें मेरे सिर के अंदर लटका हुआ फोन भूल चुकी थीं
फिर पर्दा गिरा दिया।
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मैं महज़ एक टूटे दिल वाली औरत
कौन जानना चाहता है कि तुमने उसे क्यों छोड़ा
और अपनी छाया उसके हाथों पर भूल गए
उसका धुँधला रंग छप जाता है
उन तमाम हथेलियों पर जो उससे हाथ मिलाते हैं
मैं महज़ एक औरत हूँ
जो कविता के साथ कोशिश करती है
खारी रूह पर उभर आईं झुर्रियों को मिटाने की
इनके वापस जन्नत जाने से पहले

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मधुर मधुर
मधुतर, मधुत्तम
मधुमास में उत्पन्न
मधुजाता औषध !
तेरा खनन करूं मैं मधुहित
तू मधुर, मुझे कर मधुमय
जिह्वाग्र मधुर
जिह्वामूल मधुर
समग्र बोली मधुर
चिन्तन भी हो इतना मधुर
करे वह उपासना मेरे चित्त की
मधुर मेरा आना- जाना
मधुमय उठना बैठना
हे मधुमती ! वनों में
शाखाओं पर तुम दिखती मधुर
मेरा व्यक्तित्व हो वैसा मधुर
अभिसिंचित करो ईख रस सम मधु से
प्रिया प्यार करे इतना
सह ना पाए कभी दूरी
ओ ! मधुर, मधुत्तम औषध !
मधुर बना प्रियाहित मुझे

अथर्ववेद.....1/34/1,2,3,4,5

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ज्यों हवा बहती
धरती पर
मथती जाती तिनका- तिनका
मैं करूँ प्रिया मन मंथन
तू कर कामना प्रियतमा बन
न सह कभी दूरी
हे अश्विन कुमारो !
तुम्हारी प्रेरणा से हम प्रेमी
साथ चले
आगे बढ़ें
सम भाव से
मन से मन मिलाते
सम नियम धर्मो का
पालन करते करते
सुनहर पंछी को ज्यों बींधता ज्यों शर
मेरे प्रेम बाण भी करें
कामिनी का मन छेदन
छिपे भाव उमगे बाहर
बाहर का प्रेम, मन के भीतर
बाहर भीतर, भीतर बाहर
मुझे दीखती प्रिया विश्वरूपा
हे औषध ! मिलवा दे उसका मन
ये देखो आई प्रिया,
ले मन में पति कामना
मैं आता हींसते घोड़े सा
बने सुखद
मन मा मन से मिलन
तन से तन का समागम !

अथर्ववेद..... 2/30/1,2,3,4,5
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VOL - XIV/ ISSUE-VI

नवम्बर - दिसम्बर 2019

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

 

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