मोहन राणा  की कविता
 

मोहन राणा वे युवा कवि है जो कविता के बेहद करीब और देश से काफी दूर रहते हैं, मोहन राणा की कविताए सुखद अनुभव हैं क्यों कि ये बिम्बों के उलझाव के बिना सार्थक हैं नारों से दूर रहते हुए चेतना से जुड़ीं हैं। मोहन की कविताएं अपने समय से जुड़ी होकर भी विषयवस्तु में अलग हैँ।

अनिकेत

बरस कितने बीते यहाँ इधर
वहाँ वे कहते फिर सुनाते कहानी
याद जिसे कभी करते जब तब
हम आपको याद करते हैं मैं सुनकर जैसे भूलता
धमनियों में बहते वर्तमान के तनाव को,
वे कठिन दिन अब दवा की तरह काम करते हैं ;
घर की रंगाई पुताई हो रही है बदले मौसम
और यह बाज़ार में ब्रिकी के लिये टंगा होगा
प्रोपट्री डीलर की खिड़की पर विश्वास की बाज़ार कीमत पर

रोवन के पेड़ पर झींसी बारिश में रॉबिन बोलती
चुपचाप अपनी गाँठें खोल रहा है वसंत अभी,
अंतःकरण में विगत यात्राओं से
जाने क्या खोल रख देगा वह अपनी गठरी से कोंपलों के साथ

कवि पार चला जाता है...
उपनिषद कहते हैं - सीमा पार करता है कवि

अब कौन सी सीमा यह
शब्द की सीमा
प्रेम की सीमा
भय की सीमा
मौन की सीमा
पार कर
वह एक लावारिस जगह का निवासी पूछता,
दो खिड़कियाँ उसके हाथ में इस ओर उस ओर
दो दृश्य एक साथ अनिकेत आमने सामने
मैं और तुम जैसे हमेशा हर पंक्ति में कविता उपस्थित

कि उस निगहबानी उड़ान में गोचर धरती आकाश में नहीं रहता अंतर,
शायद किसी को मालूम हो वह पता
अपने से बतकही उद्वेल में चलती रहती है आजीवन छँटाई बुनाई
और कल के बाकी वायदों के क़र्ज़ का निपटान,
कल कहा था आज फिर
जो बचा रह जाय उसे अपनी किताब में लिख देना,
तो मैं वापस सीमा पार करता हूँ
अपनी ही परछाईं पार करता,
यहाँ दो पैर बेनामी अलख सीमा को

मुझे भरोसा है कविता पर भाषा पर विश्वास नहीं रहा
जैसे अपनी हथेली की भाग्य रेखा पर नहीं रहा
(2014)



आवाज़

एक दिन अचानक मैंने जाना
जो दरवाज़ा जिसे मैं अपने घर का पता समझता आया
उसे बैंक ने मोरग़ेज किया हुआ है,
वह दुनिया के लिए दरअसल बाहर जाने का प्रवेश द्वार था,
एक दीवार जिसकी नींव पर मेरे पुरखों का सेफ़्टी डिपॉज़िट बॉक्स लगा था

एक दिन अचानक मैंने जाना
जीवन में केवल एक बात पक्की है – आश्चर्य
अपना परिचय देते अब अपने इसी मंत्र को जपते
गले लगाता हूँ नए दोस्तों को जो मुझे याद नहीं करना चाहते,
कि नई पारिस्थितिकी में जहाँ सब कुछ कच्चा रास्ता
मैं खोजता अपने को याद रखने के लिए लिखता शब्द जिनमें
कभी भी बदल सकता है भूगोल अपनी सीमाएँ

अपनी कविता पर आशा कर भरोसा रखते
लोक कथा के प्यासे कौवे की तरह भटकता भीषण गरमी में
कि मैं पी सकूँ कुछ बूँदें मटके के तल से
बटोरता कंकड़ों को रेत के ढूहों से,
मैं कहता कि यह सब कर घटता हुआ सपना है मेरे दोस्त
उस नामाकूल नज़ूमी की तरह
जिसे कभी मालूम नहीं रहता अपने भविष्य के कदमों का नक़्शा

एक बार पढ़ कर रख देता हूँ जो अब किताब ध्यान नहीं रहती
याद दिलाने के लिए नहीं रहता मुड़ा हुआ कोना उस किताब में
बचा नहीं कोई पन्ना जिसमें कोना बाकी हो
मोड़ कर रखने किए
जैसे अपने खड़े होने के लिए पैर भर जगह,
जहाँ से मैं रह पाऊँ इन शब्दों के बीच अपने आप को निर्भय

गर मुझे मालूम होता यह मसिजीवी चोला
किसी और का है
कुछ और पहन कर निकल पड़ता किसी अच्छे दिन
और संभव होता तो बदल लेता जीवनी के उस तैयार प्रारूप को चुपचाप
आपसी लेन देन में बिना ताज़ा भाव सोचे हर दिन उसी आकाश को बदलते,
यक बारगी आमने सामने चौंक कर जान लेते अपनी बदली सूरत,
पलट कर सुन पाता तुम्हारी आवाज़ फिर
एक दिन मैंने पहचाना

(2017)

 


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