अथर्ववेद के प्रेम गीत...

( गीतानुवाद.)
.रति सक्सेना


आदमी जैसे जैसे संस्कृति की ओर उन्मुख होता है, वैसे वैसे प्रकृति से कटता हुआ कृत्रिमता की ओर बढ़ता जाता है। सांस्कृतिक कृत्रिमता या तो उसके प्राकृतिक भावनाओं को कटघरे में खड़ा कर देती है या फिर ऐसी शक्ल दे देती है कि असलियत पहचानने में वक्त लग जाता है। मानवीय प्रेम को भी हमेशा इस परीक्षा से गुजरना पड़ा है। स्त्री पुरुष का प्रेम जो मानव की सहज अभिव्यक्ति है, हर दौर मे सवालों के दायरे में खड़ी होती है। विशेष रूप से ज्ञान और दर्शन इस नैसर्गिक भाव को सही रूप में व्याख्यायित नहीं कर पाते हैं । एक प्रवृत्ति ऐसी भी बन गई है कि गंभीरता को भावना से अलग करने की कोशिश की जाती है।
वेदों को अप्रतिम ज्ञान की श्रेणी में रखा जाता है , अतः यह मान कर चला जाता है कि उनमे सहज जीवन की बातें हो ही नहीं सकती। वेदों के विषय में भी उनके लोकत्व को नकारने की प्रवृत्ति रही है, यही नहीं लोकत्व को अभिचाटक की श्रेणी लाने की भी कोशिश हुई। वेद तत्कालीन समाज की अभिव्यक्ति है अतः उनमे मानवीय नैसर्गिक भावनाओं को पूरा स्थान मिला है। उन्हें जन सामान्य से अलग करने की प्रवृत्ति ने हमे उनमें निहित नैसर्गिक भावनाओं को समझने से वंचित कर दिया है। यही कारण है कि वेदों में उपलब्ध प्रेम ऋचाओं को कई विद्वानों ने अभिचाटक मंत्रों मे रखा। ऐसी ही कुछ अथर्ववेदीय प्रेम ऋचा‌ओं को पाठको के सामने रखा जा रहा है जिससे वे इन अप्रतिम प्रेम गीतों का आस्वादन कर सकें

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मधुर मधुर
मधुतर, मधुत्तम
मधुमास में उत्पन्न
मधुजाता औषध !
तेरा खनन करूं मैं मधुहित
तू मधुर, मुझे कर मधुमय
जिह्वाग्र मधुर
जिह्वामूल मधुर
समग्र बोली मधुर
चिन्तन भी हो इतना मधुर
करे वह उपासना मेरे चित्त की
मधुर मेरा आना- जाना
मधुमय उठना बैठना
हे मधुमती ! वनों में
शाखाओं पर तुम दिखती मधुर
मेरा व्यक्तित्व हो वैसा मधुर
अभिसिंचित करो ईख रस सम मधु से
प्रिया प्यार करे इतना
सह ना पाए कभी दूरी
ओ ! मधुर, मधुत्तम औषध !
मधुर बना प्रियाहित मुझे

अथर्ववेद.....1/34/1,2,3,4,5

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ज्यों हवा बहती
धरती पर
मथती जाती तिनका- तिनका
मैं करूँ प्रिया मन मंथन
तू कर कामना प्रियतमा बन
न सह कभी दूरी
हे अश्विन कुमारो !
तुम्हारी प्रेरणा से हम प्रेमी
साथ चले
आगे बढ़ें
सम भाव से
मन से मन मिलाते
सम नियम धर्मो का
पालन करते करते
सुनहर पंछी को ज्यों बींधता ज्यों शर
मेरे प्रेम बाण भी करें
कामिनी का मन छेदन
छिपे भाव उमगे बाहर
बाहर का प्रेम, मन के भीतर
बाहर भीतर, भीतर बाहर
मुझे दीखती प्रिया विश्वरूपा
हे औषध ! मिलवा दे उसका मन
ये देखो आई प्रिया,
ले मन में पति कामना
मैं आता हींसते घोड़े सा
बने सुखद
मन मा मन से मिलन
तन से तन का समागम !

अथर्ववेद..... 2/30/1,2,3,4,5

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उठ बैठ प्रिया
मत सोती रह
तुझे उठाता मैं प्रेमी
बींधता हृदय
काम के भीर तीर से
यह मेरा काम तीर
प्रतिष्ठत इसके पर
संकल्पों के कुल्मल से
कामना की नोक लगा
तीखा कर धार- धार
भेदता तेरा हृदय
पुरातन पर वाले
तीक्ष्ण काम बाण से
सुखाता हूँ तेरा दिल
तू शुचिता
हृदय विद्धा !
चली आ, चली आ
मृदुल मन
क्रोध रहित
मधुर वचन
चली आ मेरे समीप
पाया मैंने तुझे
माता, पिता से
मेरे कर्म में रत रह
मेरे चित्त में पहुँच
अनुकरण कर,
चली आ, चली आ
अरी प्रिया मत सोती रह
चली आ कामना ले मन में...!

हे मित्रा वरुणौ !
हृदय वश में करो इसका
भूल कर जग
रहे मेरे वश में बस

अथर्ववेद.....3/25/1-6
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प्रिया आ
मत दूर जा
लिपट मेरी देह से
लता लतरती ज्यों पेड़ से
मेरे तन के तने से
तू आ टिक जा
अंक लगा मुझे
कभी ना दूर जा
पंछी के पर कतर
जमी पर उतार लाते ज्यों
छेद करता मैं तेरे दिल का
प्रिया आ, मत दूर जा
धरती और अंबर को
सूरज ढ़क लेता ज्यों
तुझे अपनी बीज भूमि बना
आच्छादित कर लूँगा तुरन्त
प्रिया आ, मन में छा
कभी ना दूर जा
आ, प्रिया !

अथर्ववेद 6/8/1,2,3


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कामिनी !
कर कामना मेरी देह की
मेरी जंघाओ की
नेत्रों की
अपने मतवाले नैत्रों से
घने लहराते केशों
काम ज्वरित करती तू
मुझे जलाती रह
आ, स्वयं कामोद्दीपा
मेरे तन की कामना करती प्रिया
बाहुओं पर टिका तुझे
अंक- अंक भर लेता हूँ
तू आ,
तनिक विश्राम कर, मेरे दिल में
मेरी क्रियाओं में
रत मन हो
मेरे मन में बस जा
ओ कामिनी!
कामना कर मेरे तन की
सुन्दर नाभि वाली
सुमधुर मनस वाली
गाय के घृत से पोषित तन वाली
नारी हो मेरे वश में ।


अथर्ववेद....6/9/1,2

ज्या उतरती धनु से ज्यों
उतारता मैं क्रोध
तेरे हृदय से
तू संमनस
संचरण करे हम
सदैव सखा सम
तेरे हृदय से क्रोध उतार
दबा दूँ मैं
भारी चट्टान तले
खड़ा हो जाऊँ उस पर
तूरह बस मेरे वश में
अनुकरण कर
बस मेरा

अथर्ववेद- 6.42.1-3

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हे अश्विन
ज्यों घोड़ा दौड़े
पिया चित्त आए मेरी ओर
ज्यो घुड़सवार के बस में
लगाम से घोड़ा रहे
रहे तेरा मन
मेरे बस में
करे मेरा अनुकरण
मैं खीचता
चित्त तेरा
ज्यों खींचे राजअश्व
घुड़सवार
मथित करू तेरा दिल
आँधी में भ्रमित तिनके जैसा
कोमल स्पर्श से
कर उबटन तन पर
मधुर औषधियों से जो बना
पकड़ लूँ मैं हाथ
भाग्य का कस के
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अथर्ववेद...6.102, 1-3

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क्रमशः.................


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