हादा सेंडू (Hadaa Sendoo) की तीन कविताएँ

(मंगोलियन कवि)
अनुवाद ‍-उमा

काराकोरम


प्राचीन राजधानी, खोरखोरम
शरद रितु की बारिश से ज्यादा
नक्काशीदार पत्थर और हरिताश्म से ज्यादा
तुमने थाम रखी हैं. मेरे जिंदगी की सुप्त भावनाओं को

प्राचीन राजधानी, खोरखोरम
सुनसान में खड़े बुत की तरह
रात में युद्ध के देवता की तरह
साम्राज्य की पोशाक पहने हुए

प्राचीन राजधानी, खोरखोरम
मैं याद करता हूँ तुम्हारे बेहतरीन लम्हों को
और तुम्हारी ताकत को
मैं सबसे दु:खी कवि बन गया हूँ

प्राचीन राजधानी, खोरखोरम
सर्दी में उड़ती बर्फ से ज्यादा
तुम शान्ति हो, विशाल धरती की
और सूखे गोबर की गंध की

* काराकोरम, जिसे खारखोरम के नाम से भी जाना जाता है, 1235 से 1260 के
बीच मंगोल साम्राज्य की राजधानी थी। यह सिल्क रोड के इतिहास के सबसे
महत्वपूर्ण शहरों में से एक था।


( हादा सेंडू Hadaa Sendoo की अन्य कविताएं)


प्रगति गुप्ता  की कविता

शेष है संभावनाएं

शायद
जब खोने लगता है
वो भरोसा जिसके तहद
कोई रिश्ता
मरुथल-सी प्रेम धरा पर
अंकुरित हो, पल्लवित होता है...
जिसके पल्लवन में
जाने कितने भावों ने
सींच उसे ,
वृक्ष-सा खड़ा किया होता है..
नन्ही-नन्ही कोपलें
पत्तियों की हो या
उन पर खिलती कलियों की
जिन्होने वयस्क होते
इस रिश्ते को विस्तार दिया था.
इनके प्रेम की छावं तले
जाने कितने आते-जाते
पंछियों का भी आशियाँ बन
इसी प्रेम वृक्ष की छांव तले
उस अनंत प्रेम की अनुभूतियों को
सहेज सहेजकर रखना
सिर्फ उनका ही होना था...
घने वृक्ष की छाया में
न जाने कब,
अहम की दीमक ने घात लगाई,
उनको अंदेशा भी न हुआ था...
प्रेम और स्नेह की
सुधि जागती भी कैसे
यह उनकी प्रवृत्तियों का
कभी हिस्सा जो न था...
चूंकि-
संभावनाओ की प्रवृत्ति
कभी ठूंठ बनने की होती ही नही
सो उम्मीदों की कोपलें उनमें
निरंतर ही फूटती रही
और प्रेम ,
खत्म होता नही कभी
कुछ ऐसी-सी आस
जीवनपर्यंत जगती रही...
फ़ितरत हो जिसकी, दीमक-सी
अंदर ही अंदर खोखला करने की
चिटकते ही भरोसा
सब उलट विचारों का
संदों से आता जाता रहा...
चूंकि पहले अंकुरण से जुड़ी
भावों की मिट्टी
इतनी सौंधी और गीली थी
कि बांध रखा था,रिश्ते को उसी ने
जहां से उम्मीदों की
कोपलें फूटने को अब भी
हमेशा की तरह आतुर ही थी....

( प्रगति गुप्ता की अन्य कविताएं)
 


दफ़ैरून की कविता

 

इंतज़ार


हम उठते हैं

फिर बैठ जाते हैं

रास्ता ।

आगे जो फैला है ।

इंतज़ार ही करता रहता है ।



(दफ़ैरून की अन्य कविताएं)


शैली बौइल Shelly Bhoil  की कविता



भारत का कल

साफ़ सुथरी
शिक्षा भूषित
सुदर्शना
देश का उज्जवल कल
कहलाने वाली
मैं युवा
देश के उस कोने की
यात्रा पर थी
जब मैंने
धूल में धुला
चीथड़ों में तना
धुंए बदबू को साँसों
में लेता
कूड़े के ढेर में
अपना आज तलाशता
भारत का वो अपरिचित कल देखा !


(
Shelly Bhoil की अन्य कविताएं)
 


तृप्ति की कविताएं

#
बुनियादों में नहीं
रखी जाती
बेटियों की नाल

घरों को
नहीं रहता इंतज़ार
बेटियों के
लौट आने का
*
#
हंसती है मां
कहती है
तुझे जन कर
छोटा हो गया री
मेरा कद जौं भर!

मां के कद से
छिटका हुआ जौं
गोखरू बन गया है
रूह में धंस कर!


(तृप्ति की अन्य कविताएं }


अनामिका चक्रवर्ती की कविता


जूड़े में खट्टी गंध की तरह


धूप से सनी हुई दोपहर
मेरे पसीने से अपना चेहरा धोती है
और पसीने के नमक से उसका चेहरा
दमक उठता है
अपने दमकते चेहरे पर एक लाल टीका लगाते हुए
ओढ़ लेती है शाम का आँचल
उस आँचल में सितारों से होती है
जरदोजी की कढ़ाई

शाम जितनी ढलती रात में
सितारों की चमक उतनी बढ़ जाती है
और इन तीनों वक्त की भागीदारी में
होती हूँ मैं शामिल
अपने सपनों को बचा लाती हूँ
रात के सिरहाने तक
दिन भर यहाँ वहाँ खोसते खोसते
बार बार ढीले होते जूड़े में काँटे की तरह कसकर
उतार देती हूँ अपनी पिंडली और एड़ी के दर्द को
कलफ लगी साड़ी की तरह बिस्तर पर
जिसकी कलफ पहले ही उतर गई हो
कमर पर कसे गए आँचल से
जिससे पोंछा था मेंने, कई मुट्ठी गीले हाथों को

निकाल देती हूँ जूड़े से काँटे को
और फैला देती हूँ मोर पंख की तरह
बालों को पूरे तकिए पर

धीरे धीरे नींद सोखती है बालों की नमी से नमक
जिसे धूप से सनी दोपहर
छोड़ गई थी मेरे जूड़े में खट्टी गंध की तरह

मगर हर दिन की तरह
नींद में नमक कम ही पड़ जाता
और रात बड़ी बेस्वाद-सी गुजरती है
सुबह तक मैं फीकी फीकी सी
फिर करती हूँ कोशिश
जिंदगी की हाँड़ी में नमक स्वादानुसार
डालने की...

(अनामिका चक्रवर्ती की अन्य कविताएं)


कैलाश मनहर की कविता

और मैं

लाईब्रेरी में
बहुत पहले रखी हुई किताब
जो
सिर्फ़ दीमकों का खाद्य बनी
और मैं

गाँव का
वर्षों पहले सूख चुका कुआँ
जो है
विषैले सरीसृपों का आवास
और मैं

दूर तक
पसरी हुई लम्बी-काली सड़क
जिसे
रौंदती जाती तीव्रगति गाड़ियाँ
और मैं

मरुस्थल में
भटकता हुआ प्यासा हरिण
हर कहीं
चमकती हुई मृग-मरीचिका
और मैं

अकेलापन
गहराती हुई रात और बारिश
दूर कहीं
टिमटिमाती है प्रकाश-किरण
और मैं

(कैलाश मनहर की अन्य कविताएं )


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ