प्रगति गुप्ता  की कविता

 
पुरुषत्व
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तुम्हारे अहंकार से
जब -जब टूटी हूँ मैं
देखो -
तब - तब कुछ
नया ही रचती हूँ मैं
तुम जब-जब
ज्वालामुखी से फटे हो
मैने वहीं के उबले लावा से
खुद के लिये भावों के रत्न चुने है.....
तुम यूँ ही धधकते रहना
मैं शान्त तुम्हारे होने पर
खुद ही कुछ चुन लूंगी,
जितना उफनोगे उतना ही नया
गहरा कुछ रच दूँगी...
तुम ज्वाला हो,तो मै भी धरणी हूँ
सहर्ष ग्रहण तुम्हें करूंगी,
स्वंय को शांत उन क्षणों में
लिख - लिख कर मैं करूंगी ...
तुम बिखरना मत छोङना
मुझे इनमें पुरुष प्रवृत्ति
साँसे लेती दिखती है
कुछ गहरा सोच अपनी तुष्टि को
मै समेट कर
सृजन करना नही छोङूगी..
मैं सृजन करना नही छोङूगी....


उलटती-पलटती ज़िंदगी
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घबरा गई हूँ इस क़दर
समय की इन चालों से
कि अब नही है ख़ुद के
रहने का भी पता
उलटती पलटती ज़िंदगानी में...
छू कर गुज़रा है जो लम्हा
उसकी छुअन को चुपचाप ही
सहेजकर रख लेती हूँ
क्या पता कब
कम पड़ती साँसों को ज़रूरत हो
ऐसे ही एहसासों की...
भरोसे की भीत पर चढ़कर
कुछ हौंसले उम्मीदें
सुपुर्द किये हैं वक़्त ने,
उसी भीत के पीछे से
समेटने लगी हूँ यादें
अपने जीवंत से मौन में..
अब गुज़ारना चाहती हूं या
गुज़र जाना चाहती हूं
उम्र के इस पड़ाव के बाद
कि भीगूँ रहूं हरदम
सदियों से छूटे एहसासों के तले
और गुज़रता रहे पुलों के नीचे से
पानी कुछ इस क़दर
इतने तेज बहावों के साथ
कि पड़ते रहे छीटें शेष बची उम्र में
सकूं की ठंडकों के साथ...


सौदा
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तुमने अपने बचपन को छोड़ा
माँ का हाथ बंटाने को...
कभी उसका संबल बन
तो कभी उसे टूटने से बचाने को....
फिर सौदा किया
मायके में हक़ छोड़ने का
मायके की देहरी बचाने को....
विवाह किया एक से
पर ताक पर रख,
ख़ुद की भावनाओं को,
सौदा किया सबकी
अपेक्षाओं को निभाने का-
ख़ुद टूटकर भी,
घर को टूटने से बचाने का....
कितनी ही बार
ख़ुद के विचारों और स्वपनों का
तुम सौदा करती गई,
कभी ख़ुद से तो कभी
साथ चलने वालों की
ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए...
कभी सोचना
सौदे अगर सिर्फ तुम्हारी ही,
भावनाओं से जुड़े हो
तो कितने उथले हैं...
अगर रिश्तों को बांधने को,
तुम्हें ही बार - बार टूटना हो
ऐसे सब रिश्ते अधूरे है...
ऐसे रिश्तों को जोड़ने से जुड़े जतन
कभी पड़ते नही पूरे हैं..... ...


अप्रत्याशित हादसा
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घर तभी तक
खामोश रहते है
जब तक बनाने वाले
उनमें बसते नहीं..
बसने के बाद
कितनी आवाजें और यादें
ये घर संजोते जाते है
पता भी नहीं चलता ....
जब कभी हमेशा के लिए,
गुम हो जाती है,
उनसे जुङी कोई आवाज़,
कितना एकाकी होता है
उन आवाजों और यादों के बीच
उस व्यक्ति को खोजना
जो था बहुत अपना,
पर अब सिर्फ उसे
यादों में ही है खोजना...
माँ - बाप घर बनाकर
बच्चों के बचपन, लङकपन को
सहेजने के अलावा
उनको कष्टो को दूर रखने को
जाने क्या - क्या नहीं करते है..
घर के हर कोने में
बच्चों की यादों को
कैसे - कैसे नहीं संजोते है..
बच्चों की यादें पूंजी है माँ बाप की ,
जिनको अक्सर अकेले होने पर
दोहराते ही रहते है...
माँ- बाप के रहते बच्चों का
यूँ अचानक से चले जाना
उस घर की साँसे रोक सी देता है..
और
माँ बाप का यादें संजोने का स्वप्न
वही कहीं ठहर,
उन्हें बहुत एकाकी कर देता है..

 

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