दफैरुन की कविता

 
दफैरुन सक्षम कवि हैं जो बहुत कम शब्दों में बहुत कुछ कहने की ताकत रखते हैं। उनकी गतिशीलता महत्वपूर्ण हैं।


अंतिम आदमी

वहाँ जहाँ भीड़ थी
उस आदमी ने कुछ कहा

न कोई रुका
न किसी ने देखा
न किसी ने सुना

आदमी ने
फिर कुछ कहा
कुछ ज़्यादा ज़ोर से कहा । फिर भी
जस के तस रहे हालात

ऐसे हालातों के चलते
कोई क्या करता

वहाँ ,
वह अंतिम आदमी था
जो मारा गया ।
**

बहुत मुश्किल है

मैंने सोचा
एक घने ,सायेदार
और फलदार
पेड़ के बारे में
मैंने एक बीज रोपा

ख़ूब की देख-रेख
ख़ूब की सेवा- सुश्रुषा
बचाया हर अला-बला से

जब निकला वह
तो निकला
बबूल का पेड़
चुभाता रहा काँटे
करता रहा छलनी
पगथलियाँ

फिर मैंने
एक और पेड़ के बारे में सोचा
रोपा एक और बीज
उसे भी सहेजा
पहले के ही तरह
नहीं था ये भी
घना और सायेदार पेड़
निकला ये
खजूर का

सोचता रहा
पेड़ के बारे में
लगाता रहा
बार-बार
बार-बार
होता रहा
असफल

बहुत मुश्किल है
मेरे लिये
घने सायेदार
और फलदार
पेड़ का लगा पाना

गोया कि
मुझे नहीं है तमीज़
पेड़ों के
सही - सही
बीज के पहचान की .


भ्रम

हम अकेले कहाँ थे ?
हम रास्ते भर करते थे बातें

अकेलापन एक भ्रम था
अकेलेपन का

रास्ते भर टूटता रहा ।
**

हमें डरना चाहिए

हमें डरना चाहिए
अपनी पत्नी के लिए
हमें डरना चाहिए
अपने बच्चों के लिए
हमें डरना चाहिए
अपने मित्रों के लिए

हमारे डरने से
सुरक्षित रह सकता है
पत्नी की माँग का सिंदूर
हमारे डरने से
सुरक्षित रह सकता है
बच्चों के सिर पर
बाप का साया
हमारे डरने से
सुरक्षित रह सकता है
रेस्टोरेंट्स का अट्टहास

हमें डरना चाहिए
बिना इस चिंता के
कि हमारे डरने से
वे हुए जाते
रोज़ - रोज़
और - और कितने
कितने मज़बूत ।
*
मरा हुआ आदमी

एक आदमी
उसके भीतर से बाहर निकला
और चला गया
बोलता ये
कि मैं नहीं रह सकता तुम्हारे साथ

उस आदमी के चले जाने से
बहुत ख़ुश हुआ वह आदमी
उसने चादर उठाया
मुँह ढँका और फैल कर सो गया

मुझे आश्चर्य हुआ ये जान कर
कि मरा हुआ आदमी कितना ख़ुश होता है ।

 

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