तृप्ति की कविताएं
#
रसम पगड़ी
---------------

पता नहीं
यम के यहां
बदले हैं कुछ नियम
या नहीं !

पार हो गए होंगे
पिता
'पुं' नरक से सकुशल ?

आश्वस्त नहीं थे
पुत्री के हाथों कसे
अग्नि-विमान पर चढ़ते हुए वे.

'बस सब हो गया'
'कोई रस्म शेष नहीं'
कहते हुए सब लौट गए विदागर .

लौट आई मैं
दुखते घुटनों से
धीरे-धीरे चलते हुए-
पिता की छड़ी थामे हुए.
**
#
आटो में
बैठी है एक औरत

उसकी चुटिया में
बंधा है लाल रिबन

लाल रिबन
उड़ता है फर्र..फर्र...

फट्..फट्..फर्र..फर्र..
उड़ता है शोर करता
लाल रिबन

गोद में मचलते
बच्चे के जैसा

पकड़ से छूट
निकल भागने को आतुर

खिड़की से बाहर
स्त्री का मन !

मन की तरह
बंधा रह जाता है

उड़ता हुआ
लाल रिबन !
*
#

ठुंस कर
बैठी हैं भिंची हुई
आटो में
पसरे हुए
मर्दों के बीच
बेपरवाह औरतें
जांघ पर गुदे गोदने तक
खींचे हुए अपनी धोतियां

गोदने पर‌ चिपकी हैं
कई जोड़ी
लार टपकाती आंखें
औरतों के भीतर से
फूट रही
उजड्ड हंसी
खूंट मे बंधी है
दिन भर के
जांगर की कमाई

वे नहीं याद रखतीं
मर्द और औरत के
जिस्म का भूगोल
न गणित
अड्डे पर
उतर जाएंगी
संभालती हुई
गोद में रखी
हरी गुलाबी चप्पलें।

#
करवा चौथ
--------------

27 पत्नियों वाले
चंद्रमा की
मिन्नतें करती हैं

प्रेम के लिए
भूखी-प्यासी
मुरझाई
स्त्रियां

 

मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ