अनामिका चक्रवर्ती की कविताएं
 

महानगर

साँकल होती है शहर के दरवाजों पर
घरो में कुण्डियाँ नहीं लगी होती हैं
हर कस्बा शहर जाकर बूढ़ा हो जाता है,
जवानी पगडंडियों पर छूट जाती है।

मिट्टी के आँगन पर पड़ी दरारें
नहीं भरी जा सकती कंक्रीट से
और जहाँ भर दी जाती है,
वहाँ दरारें रिश्तों में पड़ी होती हैं।

नजर आता है आसमाँ गलियों सा,
जमीं पर गलियाँ अनाथों सी लगती है
रौनकें तो सिर्फ रातों को होती हैं यहाँ
स्ट्रीट लाईटों और गाड़ियों की हेडलईटों से।

दिन के उजाले डरते है जहाँ खिड़कियों के अन्दर झाँकने से,
वहाँ न जाने कैसे दिन और कैसी रातें होती हैं।



आँखों की भूख

पेट की भूख जब आँखों में उतरने लगती है
तुम्हारे कांटे में फंसी मरी हुई मछलियाँ
तुम वापस पानी में छोड़कर
ढूंढते हो जिंदा मछलियाँ
उन्हें फिर मारकर खाने के लिए
उसे आग में सेंक कर
अपने लोभ को पूरा करने के लिए
तुम्हारा यही स्वाभाव समाज में घुल गया
फिर तुम ढूंढने लगे
जिंदा मछलियों को कांटे में फासने के लिए
भून कर खाने के लिए
तब भुनी हुई मछलियों से नहीं
तुम्हारे दोहरे चरित्र से बू आने लगी
भूख का भी ज़मीर होता है

 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ