कैलाश मनहर
 

काल की कुचाल

तुमने देखा फूलों का खिलना और
मैं देखता रहा सोडे में भीग कर फूले हुये
तप्त तवे पर खिलते मक्का के दाने

तुमने देखी
सितारों की जगमगाहट और मैं
भाड़ में दमकते हुये
रेत कणों की चमक में खो गया
बुझता हुआ

जब
तुम्हारे गिलास में ढल रही थी मदिरा
भड़भूँजे के सीने पर बहता पसीना
भर लेना चाहता था मैं अपने प्याले में
दो बूँद

ओ रसिक शिरोमणि!
जब तुम पहाड़ों और नदियों का सौन्दर्य देख रहे थे
तो पता नहीं क्यों
मुझे दिख रही थीं दैत्याकार क्रेशर मशीनें और
अथाह गहरे ऊँचे ऊँचे बाँध

जब प्रसन्न हो रहे थे तुम
विकास की सुविधा-सम्पन्नता पर
मैं विनाश की आशँका और
अपने भीतर
पैदा हो रही दुविधा और
विपन्नता के भय से छीज रहा था
जूझता हुआ काल की कुचाल से

 

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