मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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रात जाने लगी तो आसमान बोला..शुभयात्रा
उसके शब्द सुनहरे रंगों में बदल गए,

तने ने मुस्कुरा कर सावन से पूछा.. कैसे हो?
लाल पीले शब्द फूल बन कर खिल उठे

फूलों ने मुँह खोला ही था कि शब्द खुशबू बन फैल गए
शब्द रंग, शब्द खुशबू, शब्द केनवास, शब्द शब्द, कुछ और भी है शब्दों के अलावा?

शब्द मन, शब्द ब्रह्म, शब्द ब्रह्माण्ड, लेकिन ये शब्द कभी घुँघरू की तरह घनघनाते हैं तो कभी एक दम चुप्पी साध लेते हैं। शब्द कहाँ घोड़े जैसे टटकारते हैं और कहाँ शंख से शान्त बैठ जाते हैं,मालूम ही नहीं पड़ता। कभी जख्म से खून की तरह गिरतें हैं तो कभी जंजीर बन जिन्दगी से लिपट जाते हैं

लेकिन उनकी चुप्पी में भी जान होती है, क्यों कि अर्थ होता है ना उनके पास.. जब अर्थ शब्द का साथ छोड़ देता है तो शब्द शोर बन जाते हैं...
रति सक्सेना
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उनका क्या
जो नहीं लौटते हैं घर

कभी-कभार
देह तो लौट भी जाती है
मगर रूहें खटती रहती हैं
मीलों में
खदानों में
बड़े-बड़े निर्माणाधीन मकानों में
इस उम्मीद में कि
उनका मालिक
लौटा देगा पूरी पगार

मुंतजिर आँखें
गालियाँ खाकर लौट जाती हैं काम पर...
गौरव भारत
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न रवाज़ो का डर
न मज़हब की दीवार हो,
प्यार की शुआए हो
नूर की बरसात हो,
तेरी न मेरी कोई ज़ात हो।

खुली क़िताब सी मैं
तेरा भी न कोई राज रहे,
सुबह हो सुकुनों वाली
न ग़म की अंधेरी रात हो
तेरी न मेरी कोई ज़ात हो।
तारा 'प्रीत'
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कहते हैं कि जब हम छोटे बच्चे थे
उसी समय जो लड़के जवान हो रहे थे
और उनमें से जिन लड़कों को प्यार हो जाया करता था
वे कितना प्यार करते हैं इस बात को गहराई से समझाने के लिए
अक्सर प्रेमिका को अपने खून से चिट्ठियाँ लिखा करते थे-
मिथिलेश कुमार राय 
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एकान्त श्रीवास्तव


स्मृति केवल संस्मरण या आत्मकथा की रचना सामग्री नहीं है। कला और साहित्य में स्मृति की विशिष्ट भूमिका है। स्मृति में जाना हर बार नास्टैल्जिक होना भी नहीं है। न मनुष्य स्मृति विहीन है न उसका जीवन। आज जिया गया जीवन कल सूर्योदय के साथ स्मृति में चला जाएगा। अभी- अभी कोई क्रिया पूर्ण हुई और आसन्न भूतकाल में परिवर्तित हो गई। इस तरह स्मृति में चली गई। एक निरन्तर वर्तमान के भीतर एक निरन्तर भूतकाल सक्रिय है। वर्तमान दृश्यमान है--बाहर बहता हुआ-- जल की तरह। स्मृति अन्तसलिला है -- एक सम्पूर्ण सभ्यता और संस्कृति की जड़ें जिसमें डूब कर जीवन रस ग्रहण करती हैं। मनुष्य की बहुत निजी स्मृति भी एक अर्थ में वहाँ सामाजिक स्मृति होती है, आनुभूतिक स्तर पर जहाँ दूसरे मनुष्यों की स्मृतियों से उसमें साम्य होता है। और यदि स्मृति का सम्पूर्ण स्वरूप ही सामाजिक हो-जैसे 1857 या स्वतन्त्रता आन्दोलन की स्मृति-- तब वह एक राष्ट्र राज्य की जातीय स्मृति में तब्दील हो जाती है।

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सौरभ राय की कविताएँ

मेरी गोद में
समुद्र भर आया है।

गहरे समुद्रतल से सतह तक तैरती आईं
उछलने को तैयार मछलियाँ
तुम्हारी आँखों का कौतूहल है
अपने अनमनेपन में जानती हैं जो -
चाँद एक झुनझुने से बढ़कर
कुछ नहीं है।

तुम्हारे आने में कोई कविता नहीं थी
काँप रहा था मैं
घास की अकेली पत्ती जैसे काँपती है
बारिश टूटने से पहले।
अपने शहर में आगंतुक
मैं लगातार दौड़ रहा था
गिर रहा था धड़ाम धड़ाम
सड़क के गड्ढों में
अस्पताल की बेड पर
बादलों के पीछे कहीं

अट्ठारह घंटे प्रसव के बाद
बाहर आया था तुम्हारा सिर
दुनिया की सबसे साफ़ और नाज़ुक चीज़
चेहरे पर ज़िद लिए
और थकान
और सुकून...
तुम कमरे में सबसे छोटी थी
जिससे सब डरे हुए थे

मुलायम गमछे में लिपटी
अब तुम महफूज़ हो
दूध से भरी हुई
डकारती, हिचकियाँ लेती
बड़ी हो रही हो लगातार

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'मान्योशु' जापानी कविता
अनुवाद और टिप्पणी‍-रीतारानी पालीवाल


उचित के विस्तृत समतल इलाके में
आगे बढ़ते घोड़ों की कतार
भोर की इस बेला में-
सोचती हूँ वे घोड़े की पीठ पर सवार...
गुजर रहे होंगे तृण-संकुल घास के मैदानों से।

रंग-बिरंगे झंड़ों की तरह
आकाश में तिरते बादलों पर
दूर समंदर पार,
चमक रहा है अस्त होता संध्या का सूरज...
आज रात चाँद भी स्वच्छ रहेगा शायद।

समय बीतता जाता है
होने को है आधी रात
हंसों के उड़ने की आवाज सुनाई देती है
आकाश-मानो वह सागर हो
जिसमें चाँद अपना जलपोत ले निकल पड़ा है यात्रा पर।

पूरब की हरी पहाड़ियों के पीछे
झाँक उठी प्रभात की अरुणिम आभा
मंद, मधुर, दीप्ति से झलकती
देखता हूँ
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VOL - XIV/ ISSUE-VII

जनवरी‍- फरवरी 2020

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

 

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