स्मृति और स्वप्न के बीच
 

एकान्त श्रीवास्तव

स्मृति केवल संस्मरण या आत्मकथा की रचना सामग्री नहीं है। कला और साहित्य में स्मृति की विशिष्ट भूमिका है। स्मृति में जाना हर बार नास्टैल्जिक होना भी नहीं है। न मनुष्य स्मृति विहीन है न उसका जीवन। आज जिया गया जीवन कल सूर्योदय के साथ स्मृति में चला जाएगा। अभी- अभी कोई क्रिया पूर्ण हुई और आसन्न भूतकाल में परिवर्तित हो गई। इस तरह स्मृति में चली गई। एक निरन्तर वर्तमान के भीतर एक निरन्तर भूतकाल सक्रिय है। वर्तमान दृश्यमान है--बाहर बहता हुआ-- जल की तरह। स्मृति अन्तसलिला है -- एक सम्पूर्ण सभ्यता और संस्कृति की जड़ें जिसमें डूब कर जीवन रस ग्रहण करती हैं। मनुष्य की बहुत निजी स्मृति भी एक अर्थ में वहाँ सामाजिक स्मृति होती है, आनुभूतिक स्तर पर जहाँ दूसरे मनुष्यों की स्मृतियों से उसमें साम्य होता है। और यदि स्मृति का सम्पूर्ण स्वरूप ही सामाजिक हो-जैसे 1857 या स्वतन्त्रता आन्दोलन की स्मृति-- तब वह एक राष्ट्र राज्य की जातीय स्मृति में तब्दील हो जाती है। कहने की जरूरत नहीं स्मृति कि स्मृति में ही मनुष्य और समाज का इतिहास, उसकी संस्कृति और परम्परा अक्षुण्ण रहती है। छूट गए प्रथम प्रेम की स्मृति और स्वतन्त्रता संघर्ष की स्मृति-- दोनों का स्वरूप भिन्न- भिन्न होगा। स्पष्ट है कि कला मे उनकी भूमिका महत्ता भी भिन्न- भिन्न ही होगी।

जिस प्रकार एक कारीगर के लिए एक छोटे तार, स्क्रू, पेंचकश, सूक्ष्म औजार या कील की उपादेयता होती है ठीक उसी तरह कविता की कार्यशाला में एक छोटी से छोटी स्मृति भी कवि के लिए जरूरी और मूल्यवान होती है। स्मृति में जाकर वर्तमान कुछ और निखर उठता है--फिर चाहे उसका सौन्दर्य हो या उसकी विभीषिका । सब कुछ एक नयी अर्थ दीप्ति में चमकने लगता है। कला में दूरी एक विशेष अर्थ रखती है। कुछ दूर से एक वृक्ष को आपाद मस्तक देखा जा सकता है। उसकी छाँव में खड़े होकर सान्निध्य का सुख प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन दृष्टि की सम्पूर्णता नहीं। इसलिए कवि से यह उम्मीद गलत है कि तत्काल वर्तमान को वह तत्काल कविता में बदल दे। तात्कालिता समाचार पत्रों या लेख निबन्धों की अनिवार्यता हो सकती है लिकन कविता में तात्कालिता से उसकी आयु और प्रासंगिकता --दोनों सन्दिग्ध हो उठती हैं। यों भी कवि के पास कोई चाट या ठेला नहीं है कि वह जल्दी- जल्दी मसालेदार चटपटी चीजे तैयार करे और गरमा- गरम आपके सामने परोंस दे। वर्तमान की ट्रेन जब स्मृति की सुरंग से गुजर कर आती है तब कविता में ( उसके बाहर भी) उसकी व्हिसिल बहुत दूर से और बहुत देर तक सुनाई देती है।

और स्वप्न? वह बिल्कुल दूसरा ध्रुव है। कविता स्मृति और स्वप्न के दो ध्रुवों के बीच झूलती रहती है। दो बाँस स्मृति की भूमि पर गड़े हैं और दो स्वप्न की भूमि पर। दोनों के बीच धधकता वर्तमान है। इस धधकते वर्तमान के ऊपर तनी हुई रस्सी पर कवि को नट की तरह केवल एक बाँस के सहारे सन्तुलन बनाते हुए चलना पड़ता है। दूसरा और बीच का रास्ता नहीं। जो आगे का मार्ग प्रशस्त करता है, वह स्मृति नहीं कोई स्वप्न होता है। स्वप्न भविष्य की रूपरेखा है। कविता स्मृति से आरंभ होती है और वर्तमान को पार करती हुई स्वप्न तक पहुँचती है। इस तरह वह काल के उन तीन बिन्दुओं का संस्पर्श करती है जिन्हें मोटे तौर पर हम भूत, वर्तमान और भविष्य के रूप में जानते हैं। जिस तरह केवल स्वप्नजीवी कविता सामाजिक सत्य को प्रकट करने में असमर्थ होती है उसी तरह केवल स्मृति की परिक्रमा करने वाली कविता भी अपनी सीमा स्वयं निर्धारित कर लेती है। उपर्युक्त दोनों प्रकार की कविताएँ उसी तरह नष्ट हो जाती हैं जिस तरह दिये की लौ से आसक्त पतंगे उसमें जलकर नष्ट हो जाते हैं। केवल स्मृति या केवल स्वप्न से आसक्त कविता अपना एक नास्टैल्जिक या यूटोपियन संसार रचने लगती हैं।

 


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