कंचन की कविताएँ
 
अनोखा होना

अनोखा होना; सूखी ठूंठ पर नई कोपलों का उग आना.
कुछ स्त्रियाँ अनोखी होती हैं
प्रेम और स्वप्न को जीती हुई.
देह के भीतर गुंथी हुई कसकः
तुम्हारी जिद जिसे धार देती हुई.
थककर नदी भी सुस्ताती होगी.
नीले आसमान पर टंगा हुआ पीला चांद.
अपनी ताकत के विस्तार में जीता पुरुष,
ताकत को ढोता पुरुष,
ताकत को देरतक संभालने के प्रयास से जूझता,
और व्यर्थ ही स्खलित हो जाता.
क्या चाहिए आखिर...
जीत के बाद हार, पाने के बाद खोना,
प्रेम के आधिक्य से उपजी निराशा के सिवाय.
चौराहे की लालबत्ती पर, सम पर टिकी गाडिय़ों से उपजे
कोलाहल के मध्य,
आसमान के बीचोंबीच ठहरे हुए सूरज के नीचे
थकान से उपजी नींद में ठेले पर सोया हुआ श्रमिक...
सब कुछ है अनोखा सा ;
रात का बुझ जाना:दिन का रोज उग आना।
किसी ठहरे हुए जीवन में नन्हे से क्षण से उपजी मुस्कान की लहरिया..
अनोखेपन से ही बची है गीली धरती के भीतर
सोए हुए जीवन का नन्हा बीज.

(कंचन  की अन्य कविताएं)


आभा दुबे  की कविता

गुमनाम शायर


शहर में रहता था एक गुमनाम शायर
सो जाता था जब सारा शहर
वो उठकर अपने मकान से कब्रिस्तान में जाता था

वह अपनी शायरी कब्र में दफ्न
मीर,ग़ालिब, फैज और इक़बाल को सुनाता था
सब दाद देते थे उसकी शायरी की
गुमनाम शायर खुश होता था

पिछले दंगे में शायरी सुनाते हुए कब्रिस्तान में ही वह मारा गया
दफ्न शायर आज भी उसके इंतजार में
अपने दामन में लगे लहू के छींटों को आँसुओं से धोते हैं

गुमनाम शायर का हत्यारा
मंच पर ग़ालिब का शेर पढता है
'जो आँख से न टपके वो लहू क्या है '

ग़ालिब छाती पीटकर कब्र में करते हैं विलाप
मीर को बिना 'मय ' के आ जाती है नींद
डर जाते हैं इक़बाल हर शाख पर बैठे उल्लू से
फैज़ अपनी ही नज्म गुनगुनाते हैं
'चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले '

एक शोधकर्ता की नयी शोध आई है सामने
कि गुमनाम शायर
हर शहर-क़स्बा ,बस्ती और नुक्कड़-गली में पाए जाते हैं
वो शायरी करते हैं और मारे जाते हैं

शोध शत -प्रतिशत सच है
गुमनाम शायर हम सबके भीतर होता है
हमारे ही भीतर होता है उसका हत्यारा भी
हम एक साथ शायर भी हैं और हत्यारा भी
हमीं गुनाह और हैं हमीं गुनाहगार भी!

(आभा दुबे की अन्य कविताएं) 


प्रगति गुप्ता की कविता

अप्रत्याशित हादसा
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घर तभी तक
खामोश रहते है
जब तक बनाने वाले
उनमें बसते नहीं..
बसने के बाद
कितनी आवाजें और यादें
ये घर संजोते जाते है
पता भी नहीं चलता ....
जब कभी हमेशा के लिए,
गुम हो जाती है,
उनसे जुङी कोई आवाज़,
कितना एकाकी होता है
उन आवाजों और यादों के बीच
उस व्यक्ति को खोजना
जो था बहुत अपना,
पर अब सिर्फ उसे
यादों में ही है खोजना...
माँ - बाप घर बनाकर
बच्चों के बचपन, लङकपन को
सहेजने के अलावा
उनको कष्टो को दूर रखने को
जाने क्या - क्या नहीं करते है..
घर के हर कोने में
बच्चों की यादों को
कैसे - कैसे नहीं संजोते है..
बच्चों की यादें पूंजी है माँ बाप की ,
जिनको अक्सर अकेले होने पर
दोहराते ही रहते है...
माँ- बाप के रहते बच्चों का
यूँ अचानक से चले जाना
उस घर की साँसे रोक सी देता है..
और
माँ बाप का यादें संजोने का स्वप्न
वही कहीं ठहर,
उन्हें बहुत एकाकी कर देता है..


(प्रगति गुप्ता की अन्य कविताएं)


मिथिलेश कुमार राय  की कविता

कथा में प्रेमी का विवरण


कहते हैं कि जब हम छोटे बच्चे थे
उसी समय जो लड़के जवान हो रहे थे
और उनमें से जिन लड़कों को प्यार हो जाया करता था
वे कितना प्यार करते हैं इस बात को गहराई से समझाने के लिए
अक्सर प्रेमिका को अपने खून से चिट्ठियाँ लिखा करते थे
सुनते हैं कि खून से लिखी चिट्ठियाँ देखकर
प्रेमिका इतनी भाव-विह्वल हो जाया करती थीं
कि वे भी ब्लेड़ से अपनी हथेली काट लिया करती थीं
खून से लिखीं चिट्ठियाँ प्रेमी तक उनके आंसु में भींगी हुई पहुंचा करती
कि चिट्ठी के सारे शब्द अस्पष्ट हो जाया करते
कि प्रेमी को पूरे कागज पर खून ही पसरा हुआ मिला करता
जिसे छाती से लगाए प्रेमी
और अधिक एकांत की ओर भागता
और वहाँ बैठकर घंटों हिचकता रहता
कहते हैं कि तब प्रेमिका
सब्जी काटते हथेली कट गई का बहाना गढ़ा करतीं
और प्रेमी आँखों में धूल या कोई कीड़ा चले जाने की बातें कहकर
अपनी बेबसी को छुपाने की कोशिश किया करते थे
तब प्रेमिका पकड़े जाने पर कितनी मार खाती थीं
कथा में इसका विवरण सुनते हुए
आँखों के पोर से आंसु लुढक पड़ते हैं
कहते हैं कि तब प्रेमिका
आनन-फानन में
किसी दूर देश में ब्याह दी जाती थीं
यह भी कहते हैं कि
तब जब यह बात जग जाहिर हो जाती थी
प्रेमिकाएं लड़कियाँ कुलच्छनी की संज्ञा में
तब्दील हो जाया करती थीं
और उसकी किस्मत शेष दिनों के लिए
बदकिस्मती में बदल जाती थी
इस कथा में पकड़े जाने के बाद प्रेमी लड़के का
कोई खास विवरण नहीं मिलता
न वे तन कर खड़ा होते
न ही नायक की तरह भिड़ते
वह अचानक ही परिदृश्य से कहीं अदृश्य हो जाते थे
जब उगते
उसी तरह हँसते गाते
फिर दुनियादारी में लग जाते

 

 प्रस्तुति - मीता दास

(मिथिलेश कुमार राय  की अन्य कविताएं)
 


गौरव भारती की कविता

कैद रूहें

उनका क्या
जो नहीं लौटते हैं घर

कभी-कभार
देह तो लौट भी जाती है
मगर रूहें खटती रहती हैं
मीलों में
खदानों में
बड़े-बड़े निर्माणाधीन मकानों में
इस उम्मीद में कि
उनका मालिक
लौटा देगा पूरी पगार

मुंतजिर आँखें
गालियाँ खाकर लौट जाती हैं काम पर...

पल भर के लिए
बेबस आँखें टकराती हैं
बाट जोहती निगाहों से
मगर हथौड़े की चोट
उस पुल को ढहा देती है
जहाँ से मकां और घर के बीच का
सफर तय होना है

यहाँ सिर्फ ज़िस्म कैद नहीं हैं
रूहें भी कैद हैं
जो कभी-कभी दिख जाती हैं
ईटें जोड़ते हुए
रात के तीसरे पहर में

सुना है मालिक कोई जादूगर है
उसके पास कोई मन्त्र है
जिसके सहारे
वह कैद कर लेता है रूहों को

रूहें कैद हैं
खट रही हैं
खप रही हैं
नहीं लौटती हैं घर
महज़ आवाजें सफर करती हैं
निगाहें उसके पीछे चल देती हैं

एक घर है
जो बरखा को देख सर छुपाने लगता है
राह तकती निगाहें हैं
एक बूढ़ा बरगद है
जो ढहने वाला है
आम और अमरुद के छोटे-छोटे पौधे हैं
बेपरवाह परवरिश के शिकार
और एक इंतजार है
पुल के इस तरफ भी
पुल के उस तरफ भी...


(गौरव भारती की अन्य कविताएं }


तारा 'प्रीत' की कविता

तेरी न मेरी कोई ज़ात हो

न रवाज़ो का डर
न मज़हब की दीवार हो,
प्यार की शुआए हो
नूर की बरसात हो,
तेरी न मेरी कोई ज़ात हो।

खुली क़िताब सी मैं
तेरा भी न कोई राज रहे,
सुबह हो सुकुनों वाली
न ग़म की अंधेरी रात हो
तेरी न मेरी कोई ज़ात हो।

थोड़ी शरारत हो
थोड़ी सी संजीदा हो
ज़िन्दगी अपनी,
ख़ुशी का नज़राना हो और
दुआओं की सौग़ात हो।
तेरी न मेरी कोई ज़ात हो।

न पूछना तुम
मुझसे मेरा अतीत,
मुझे भी कोई मतलब नहीं
तेरे गुज़रे ज़माने से,
न शक हो, न यक़ीन की बात हो।
तेरी न मेरी कोई ज़ात हो।

तेरे और मेरे बीच फ़क़त
अहसास का एक रिश्ता हो,
तुम भी दिल से निभाना इसे
मैं भी रूह से करूँगी क़ुबूल,
सिवाय इसके न कोई जज़्बात हो।
तेरी न मेरी कोई ज़ात हो।

मुद्दतों बाद तो,मिले है हम
न बिछड़ने की बात करना,
तुम थाम लेना हमारी बाहें
हम न छोड़ेंगे तुम्हारा दामन,
ख़िलाफ़ चाहे ये पूरी क़ायनात हो।
तेरी न मेरी कोई ज़ात हो।

बसाने दे तू अपनी सूरत
मुझे अपनी इन आँखों में,
चन्द लम्हें तो गुज़ारने दे
मुझे तू साथ अपने,
शायद न फिर मुलाक़ात हो
तेरी न मेरी कोई ज़ात हो।

( तारा 'प्रीत' की अन्य कविताएं)


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