कंचन


गायब होता हुआ एक दिन


दूब के नोक की तरह है, नाजुक पर नुकीला.
अपनी शुरुआत से ही बेहद सजग.
क्या हुआ जो कुछ भी निर्धारित नहीं है.
जैसे आएगा वैसे ही ओढ लिया जाएगा.
पूरा का पूरा .गुंजाइश नहीं होती है नकारने की.
सच थोड़े न है जो बहुरंगी है.
पनीला सा है.
गायब होता हुआ एक दिन.
पहाड़ की तरह चढाई भरा; बीच में आश्वासनों की दुपहरिया है.

सरसराती हवा जब भी छूकर गुजर जाती है
ऐसा लगता है मानो सारी थकान ले जाती है अपने साथ.
वह उस नये दिन की थकान नहीं है.
फिर सांझ की उतराई रात की थपकी मे बदल जाती है.
एक गायब होते हुए दिन में;गायब हो जाती हैं उम्मीदें.
अगर पलभर के लिए इसमें तुम्हारी मुस्कान न शामिल हो,
सारा दिन खामोशी मे तुम्हें सुनते हुए मेरा इंतजार न हो,
अगर खिलते हुए फूलों की मासूम खिलखिलाहट न दिखाई दे.

फिर रात का क्या है...
अंधेरा, गाढा-स्याह,
जो लील लेता है एक समूचे दिन के उजाले को.

नटनी का खेल

दुरूह है जीवन को साधना.
अचरच है ,कैसे साध लेती है नटनी एक तनी हुई रस्सी पर खुद को.
एक टांग हवा में, एक रस्सी पर
और दोनों कांधों पर सारा वजन.
मुंह बाये,गोल गोल आंखों से साठ बरस के बूढे भी सांस थामे ताकते हैं

उसे और दिल में... कहीं गिर न जाए बूझते हैं.
जबकि कुछ कुछ वे खोल चुके होते हैं जीवन के ताले को.
कठिन है नहीं रस्सी पर खुद को तानना.
कठिन है देह के भीतर धधकती आग को बुझाना.

तेरह चौदह बरस के छोकरे मानो तैयार बैठे हों..
अब गिरी कि तब गिरी.
मगर गिरती कहाँ है नटनी.
थामे रहती है डोर को,डोर पर चलते हुए.
छोकरे उसके चाल में छिपे रहस्य को
नकारते हैं.. उहुं ,मैं भी कर लूंगा.
कुछ कठिन नहीं है..
कहकर वह जुगाड़ मे लग जाते हैं रस्सी के.
नटनी नया खेल बन जाती है.
 


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