आभा दुबे   की कविता

 
चुप्पी की विरासत


किताबों के काले अक्षरों को चीटियों की कतार बताने वाली
हिसी पुडुंगी स्कूल नहीं जाती
अखबार नहीं पढ़ती
पर अखबारी कागजों से ठोंगे गजब के बनाती है

वह सिनेमा नहीं देखती
मगर सुनाती है घोटुल , मुटियारिनों
और सैकड़ों जागृत देवी-देवताओं की कहानियाँ और दन्तकथाएँ

विचारों की परिष्कृत दुनिया को दूर से सलाम करती हिसी
किसी बातचीत या बहस में भी शामिल नहीं होती
इतिहास पढ़ा न भूगोल जाना
मगर जानती है वह सागौन , सखुआ , महुआ, इमली , तेंदुपत्ता उगाना और सहेजना

कला का क अक्षर भैंस बराबर है उसके लिए
पर मांदर की थाप पर पंथी ,सुआ , राउत , सैला नाच में सानी नहीं उसकी

चाँद से चेहरे पर चन्दा सी गोल बिंदी लगाती हिसी के लिए
रोटी ही उसका भूगोल है और जिन्दगी किताब
उसके जंगल की चौहद्दी ही देश है उसका
जिसे वो प्यार करती है और चुप रहती है

ये चुप्पी विरासत है
जिसे तारीख दर तारीख ढोती हिसी
जनतंत्र की सबसे विश्वासी नागरिक कहलाती है
(आदिवासी लड़की हिसी के लिए )

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जो उपयोगी नहीं रह गए


आपने कभी देखा है
बूचडखाने में जाते हुए मवेशियों को ?
महसूस किया है उनकी आँखों में काँपते
अंत की छाया को ?

वो जान गए होते हैं उनका अंत निकट है
तय हो गया है कि वे अब काटे जायेंगे मशीन से

अपने खात्मे की जानते हैं वो एक माकूल वजह
कि अब नहीं रह गए उपयोगी उनके लिए
जो तय करते हैं उपयोगिता से किसी के होने न होने को
अब उनकी अंतिम उपयोगिता उनका गोश्त , उनकी चमड़ी ही है

दुनिया के बूचडखाने में
मैं देखती हूँ उन मवेशियों को और महिला से मवेशी हो जाती हूँ

मेरी भी उपयोगिता तय करनेवालों
मेरे खौफ को
मेरी आँखों में नहीं ,
हत्या के बाद मेरे अस्थि-मज्जा में ढूंढना !


 

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