मिथिलेश कुमार राय

 

पता नहीं क्या कुछ
 
घर सिर्फ सपने में देखता हूँ
सपने में एक साइकिल भी दिखती है
कभी-कभी सपने में रेडियो भी बजने लगता है
जिसकी मधुर आवाज से
चौंक-चौंक जग जाता हूँ
फिर रात अंधेरी जान सो जाता हूँ
हँसना सिर्फ सपने में हो पाता है
पान खाना गुनगुनाना सब सपने पूरा करते हैं
कई रात सपने में देखा कि
स्त्री नई साड़ी में मुसकुरा रही हैं
हँस-हँस के कोई गीत गा रही हैं
बच्चे की छाती की हड्डी ढंक गई है
वह पतंग की तरह हवा में कहीं उड़ा जा रहा है
सवेरे सोचता हूँ तो सिर्फ रोटी सोचने लगता हूँ
नमक सोचने लगता हूँ
पैरों में जो बिवाई फट गई है वो सोचने लगता हूँ
बच्चे के होंट फट रहे हैं
स्त्री हमेशा साग के मौसम के बारे में सोचती रहती हैं
यही सब सोचने लगता हूँ
दिन में सूर्य जैसे हमारी मुसकान सोखने उगता हो
रात आती है तो सपने साथ लाती हैं
हँसने की वहाँ कोई मनाही नहीं
कई बार सोचता हूँ कि पूछुंगा कि
क्या सपने में स्त्री को भी मुसकुराने का मौका मिलता है
क्या सपने में मेरा बच्चा भी खिलखिला उठता है
पर उनकी आँखों में ठहरी उदासी देख सहम जाता हूँ
तब तो पता नहीं क्या कुछ सोचने लग जाता हूँ |
००००००००

आँखों में सपने सुनहरे थे

होने को यह हो सकता है कि वह पतझड़ का मौसम रहा होगा
पत्ते झड़ रहे होंगे
फूल सूख चुके होंगे
नंगे वृक्ष पर बैठी कोई चिड़िया
धरती पर कहीं हरापन खोज रही होगी
होने को यह भी हो सकता है कि
वह समय कुछ खतरनाक सा रहा होगा
चेहरे डरे हुए होंगे
हँसी छुपी हुई होंगी
कोई खुलकर गीत नहीं गाता होगा
चुप रहता होगा कुछ बुदबुदाता होगा
आँखें कोई उम्मीद ढूंढ़ रही होगी
मगर मेरा वसंत तभी आया था
मुझे सूखे हुए वृक्ष की जड़ में
फूटता हुआ कोंपल ढूंढ़ना था
जहाँ से फूल झड़कर गिरा था वहाँ से ऊपर |
एक कली खोज निकालनी थी
मुझे उन चिड़ियों की तलाश करना था जो
अब भी हवा में गोते लगाती आसमान से अठखेलियां करने का साहस रखती थीं
मेरी आँखों में कुछ सपने थे जिसका रंग सुनहरा था
मेरे ओठों पर थोड़ी सी हँसी थी जिसका स्वाद मीठा था
सामने कोई चेहरा था जो बिलकुल वसंत जैसा था
०००००००००

 प्रस्तुति - मीता दास


 


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