गौरव भारती की कविताएं
अख़बार

वेंडर
सुबह-सुबह
हर रोज
किवाड़ के नीचे से
सरका जाता है अख़बार

हाथ से छूटते हुए
जमीं को चूमते हुए
फिसलते हुए
अख़बार
एक जगह आकर ठहर जाता है
इंतजार में

अख़बार
इश्तहार के साथ-साथ
अपने साथ ढ़ोती है
एक विचारधारा
जिसे वह बड़ी चालाकी से
लफ्फबाजी से
पाठकों तक छोड़ जाती है

पढ़ने से पहले
राय बनाने से पहले
जरा ठहरिए
हो सकता है
आप दुबारा छले जाएं
पिछली बार की माफ़िक
जब आपने बाजार से
वह सामान उठा लाया था
महज इश्तहार देखकर ...


तुम आना


जब शब
ख्यालों में गुजरें
वक़्त रेत की तरह फिसले
तुम आना
तसव्वुर की तस्वीर बनकर
अपनी अँजुरी बढ़ाकर
थाम लेना
फिसलते हुए इस वक़्त को
जैसे थामे रहता है वृक्ष
साहिल पर खड़े बेताब नाव को
एक डोर के सहारे

जब गुलाब की पंखुरियाँ
मुरझाने लगे
अपनी महक
वह खुद भुलाने लगे
जब पत्ते गिरने लगे
टूट-टूट कर शाख़ से
हवा थप्पड़ की माफ़िक पड़ने लगे
शिलाओं पर जब
धूप आकर ठहरने लगे
तुम आना
बारिश की बूंदों को ओढ़कर
जैसे चाँद आता है
फलक पर सितारे लिए

तुम आना
इंद्रधनुष बनकर
जब मेरी ज़िन्दगी
स्याह रात के साए में हो

एक ही धुन
जब कानो पर शोर मानिंद लगने लगे
दिल किसी अनजान शहर की तलाश करने लगे
शोर में कहीं
जब आवाज मेरी खोने लगे
जब मेरे अल्फ़ाज़
डर के मारे लड़खड़ाने लगे
तुम आना
मुझे सुनना
थाम लेना
मेरा हाथ
ताकि मैं खोने से पहले
तुम्हें पा सकूँ
जिंदगी का वह अध्याय
लिख सकूँ
जो अब तक महज़ एक ख़्वाब है
जो हर रोज
नींद को मुक़म्मल कर जाती है.....
 

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