तारा 'प्रीत'  की कविताएं
 

जीवन

उदास क्यों हो?
क्यों ठंडी
आहें भरते हो?
निराशा ने क्यों
तुमको पकड़ा है?
मजबूरियों ने क्यों
तुमको जकड़ा है?
वक़्त से नाराज़ क्यों?
तक़दीर से
शिकायत कैसी?
निकल कर
एक बार तो देखो,
अपने ही,
बनाये दायरे से।
फिज़ाओं की
ठंडी हवा की ठंडक,
अपने अंतर्मन से
महसूस करो।
भर लो,
अपनी बाहों में
विस्तृत आकाश को।
सप्तरंगीय इंद्रधनुषीय
सपनों में भर दो
अपनी आशाओं के,
रंगीन रंग।
एक बार,
सिर्फ़...
एक बार,
लगाओ उन्मक्त सा,
ठहाका।
पल भर में,
निचोड़ लो,
अपने सम्पूर्ण
जीवन का सार।
क्योंकि--
सिर्फ सांस
लेने का नाम ही तो
जीवन नहीं है।


मेरा अस्तित्व

आज क्या?
कभी भी तुमने
मेरे अस्तित्व को
स्वीकार ही
नहीं किया।
हमेशा हुक़ूमत
चलाई अपनी,
मेरी भावनाओं को
समझने का ,
रत्ती भर भी
प्रयास नहीं किया
कभी तुमने।
एक मोहरे की तरह
खेलते रहे,
मेरी सम्वेदनाओं के साथ।
मेरे बहते आंसुओ को
दिखावा कह कर,
झुठलाते रहे।
मेरी चुप्पी को
समझ कर,
मेरी कमज़ोरी
हावी होते गए,
तुम मुझ पर।
मेरी हर बात
तुम्हें बेतुकी लगी,
मेरी हर सलाह
बेवज़ह लगी,
कभी एतबार ही
नहीं किया
तुमने मुझ पर।
रुक गए आकर
मेरे ज़िस्म पर,
मेरी रूह तक तो
तुम कभी
पहुँचे ही नहीं।
एक बार तो
टटोला होता
मेरा अंतर्मन,
एक कोशिश तो की होती
मुझे समझने की,
तो तुम समझ जाते
मैं क्या हूँ?
मैं कौन हूँ?

 


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