मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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इस अंधेरे नरक में मौन गहन प्रतीक्षारत है,
मेरे कानों सन्नाटे से सुन्न हो रहे है, मैं जोर से चिल्लाता हूं,
लेकिन कोई भी सुनता नहीं, जवाब भी नहीं देता, वे दूर हो या पास.
दुखरत सर्बिया युद्ध के दौरान अचरज में था,
और तुम भी अभी तक,
इतना अविश्वसनीय दूरी पर होते हुए भी।

मेरा दिल तुम्हारे सपनों में तुम्हारे समक्ष खड़ा रहता है
दिन भर मैं तुम्हारे हृदय में बार -बार तुम्हारी ध्वनि सुनता हूँ
मानों कि मैं विशालकाय पर्वत बन गया हूँ
फर्न की मन्दिम सरसराहटें और चारों ओर फुसफुसाहटें
सब ओर एक दम ठण्डा, मौत जैसा

नहीं जानता कि हम अब कब मिलेंगे.
तुम प्रार्थना की तरह शान्त और प्रभावशाली थी
एक छाया के रूप में रौशनी से कहीं अधिक चमकदार,
मैं बहरा, मूक, अंधा होने पर भी तुमसे मिल सकता था
लेकिन इस वक्त अदृश्य सा हूँ; अभी तक भीतर
रति सक्सेना
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*
आज अगस्त की आठ तारीख है
और सुबह के आठ बजे मैं बैठा हूँ
प्लेटफार्म संख्या आठ पर
धनबाद स्टेशन की मुधि पर
जहाँ अमूमन खत्म होता है शहर
और शुरु होता है एक दूसरा शहर |
अनिल अनलहातु
*
पिता की मृत्यु किस साल हुई
वह मुझे याद नहीं है
अगर कोई पूछता है तो
मैं दुसरी तरफ मुंह करके ताकने लगता हूँ
मुझे हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिरने का
साल भी याद नहीं है
मेरे पास है पिता की पुरानी कमीज़
मैं उसे पहन कर
आईने के सामने आकर खड़ा हो जाता हूँ
पर मेरे कन्धे पिता की तरह नहीं हैं |
रोहित ठाकुर
*
पूरे घर में तब एक ही
घड़ी हुआ करती थी,
पिता जिसे हाथ में बांधते और
उसी से शुरू होती थी
आशीष दशोत्तर 

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मंजूषा कला में मिट्टी का महक है। रंगों का गमित और रेखाओं का ग्रामर इस कला में एक रहस्यलोक बनाता है...और यही वजह है कि सदियों से यह कला लोक को मानव और सर्प के रिश्ते को समझाने की कोशिश करता रही है, लेकिन फिर भी मंजूषा कला को जानने वाले बहुत कम हैं।

इस देश में शायद बहुत कम लोगों को मालूम है कि मंजूषा कला सदियों पुरानी एक ऐसी कला परंपरा है, जिसकी उत्पति बिहुला-बिषहरी की कथा के साथ जोड़कर देखा जाता है। लोकमान्यता है कि बिहुला ने अपने पति बाला के सर्पदंश उपचार के लिए एक नौका तैयार करवाई थी। उसी नौका पर बिहुला अपने पति को नदी के रास्ते से लेकर गई थी। उस नौका को उस समय के कुशल चित्रकार लहसन माली ने अपनी सूझ-बूझ से सजाया था....और लहसन की कला कहलाई थी मंजूषा कला।

आज भी जब बिहुला-बिषहरी की पूजा होती है तो लोग एक मंदिरनुमा आकृति देवी को भेंट करते हैं...जिसे मंजूषा कहते हैं...

देव प्रकाश चौधरी


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वह आकाश की ओर देखती थी
गाँव की छत पर लेटी एक छोटी बच्ची
दो हरी पत्तियों और एक नन्हें से लाल गुलाब की उम्मीद में
जब कि एक बड़ा सा नीला मिज़ाईल
जिस पर बड़ा सा यहूदी सितारा बना है
गाँव के ठीक ऊपर आ कर गिरा है
जहाँ 'इरिगेशन' वालों का टैंक है
(यह मेरा ही गाँव है)
धमक से उस की पीठ के नीचे काँपती है धरती
अब क्या होगा?
उस बच्ची ने उम्मीद छोड़ दी है
वह इंतज़ार करती है

दस....
नौ....
आठ....
कच्चे डंगे
सड़ी हुई बल्लियाँ
ज़ंग लगी चद्दरें टीन की
ढह जाएंगी भरभरा कर पल भर में, उम्मीदें
(मैंने ही छोड़ दी थीं तमाम उम्मीदें)
जब कि एक और मिज़ाईल आया है
लहराता हुआ सफेद सफेद सा
वह नदी की ओर चला गया है
जहाँ आई०टी०बी०पी० का कैम्प है

और एक और, जिस पर बहुत सारे सितारे और धारियाँ हैं
वह केलंग के पीछे कक्र्योक्स के उस पार गिरा है
जहाँ बहुत बड़ा डैम बन रहा है
चारों ओर सन्नाटा है
न कम्पन है न धमाका है
अजेय की कविता
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तोहि छैला मैं छाती लगाये रहिहौं।
आँखिन ते कछु दूरि न करिहौं पुतरी प्यारे बनाये रहिहौं।।

पलकन ते नित पायँ दाबि के उर पर सदा सोआये रहिहौं।।
जो कछु भौंह चढ़ी देखिहौं तौ परि पैयाँ मनाये रहिहौं।।
डारि गरे तोरे अपनी बहियाँ प्रेम के जाल फँसाये रहिहौं।।
प्रिय प्रताप तोरी इक छबि पर दूनों लोक लुटाये रहि हौं।।
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कसकै मोरे रे करेजवा तोरे नैना बाँके बान।
नहिं भूलति जस वह दिन तानी बाँकी भौंह कमान।।
जादू भरी रसीली चितवन प्रेम भरी मुसकान।
छिन छिन पल पल पर सुधि आवत बिसरावत सब ज्ञान।।
अब "परताप"न जीवन रहिहैं अधर रस दान।
प्रताप नारायण मिश्र

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VOL - XIV/ ISSUE-VIII

मार्च -अप्रेल 2020

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

 

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