प्रेम कविता बतर्जे जनप्रतिनिधित्व की कविता

अक्सर साम्यवाद वैचारिकता कविता की हकीकत से नजदीकता पर जोर देती है, निसन्देह इसमें कोई गलत बात भी नहीं, समाज या जीवन की दुर्दान्त अवस्था को नकार कर हम मात्र प्रेम और सौन्दर्य की बात नहीं कर सकते, लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि कभी प्रेम दुर्दान्त अवस्था में जीने की ताकत देता है। दूसरे महायुद्ध की बात है, अनेक यहूदियों को बन्दी बना कर कन्सन्ट्रेशन कैम्प में रखा गया था, जिनसे युद्ध के समय मजदूर सैनिकों का काम लिया जाता था, इन मजदूरों में बड़े संगीतकार, कवि, और तमाम बुद्धिजीवी भी होते थे। जब ये मजदूर कम भोजन और अधिक परिश्रम के कारण कमजोर हो जाते तो उन्हें दूसरे कन्सन्ट्रेशन कैंम्प में भेज दिया जाता था़ हां यात्रा पैदल ही करनी होती थी। अधिकतर कमजोर लोग रास्ते में ही मर जाते थे।
सन 1940 की बात है, एक हंगेरियरन यहूदी, पोलेण्ड के मिकलोस रेडनोटी नामक कवि को उक्रेन की सीमा पर मजदूर सैनिक एक तरह से सेना में स्लेव के रूप में थे़ और कन्सन्ट्रेशन कैम्प में रखे गये थे। 1944 में उन्हें अन्य दास सैनिक मजदूरों के साथ यूगोस्लाविया भेजा जा रहा था। मिक्लोस के पास एक काफी थी, जिस पर वे कुछ लिखते जा रहे थे, एक सैनिक ने देखा तो उन्हें मारा पीटा , और जब वे एक कदम भी चलने लायक नहीं रहे तो उन्हें अन्य कमजोर चालीस बन्दियों के साथ गोली मार दी गई। सब को सामूहिक कब्र में दफ्ना दिया गया। कब्र का काम किसी साथी बन्दी ने ही किया होगा, तभी तो उसने मिक्लोस रेडनोटी के सीने पर कापी रख दी, जिसे युद्ध के उपरान्त मिक्लोस की पत्नी ने पाया।
उनकी चार कविताएं विश्व की युद्ध अवसर पर लिखी गई कविताओं में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं, लेकिन यदि प्रेम कविता की दृष्टि से देखा जाये तो ये युद्ध विहीन शान्ति काल में लिखी गई कविता से भी ज्यादा श्रेष्ठ हैं। यहां कविता मानवता के सामने प्रेम और युद्ध के बीच प्रेम को रेखांकित भी करती है। मैं उन पोस्टकार्ड कविताओं में से अन्तिम कविता दे रही हूँ ।
पोस्टकार्ड चार

इस अंधेरे नरक में मौन गहन प्रतीक्षारत है,
मेरे कानों सन्नाटे से सुन्न हो रहे है, मैं जोर से चिल्लाता हूं,
लेकिन कोई भी सुनता नहीं, जवाब भी नहीं देता, वे दूर हो या पास.
दुखरत सर्बिया युद्ध के दौरान अचरज में था,
और तुम भी अभी तक,
इतना अविश्वसनीय दूरी पर होते हुए भी।

मेरा दिल तुम्हारे सपनों में तुम्हारे समक्ष खड़ा रहता है
दिन भर मैं तुम्हारे हृदय में बार -बार तुम्हारी ध्वनि सुनता हूँ
मानों कि मैं विशालकाय पर्वत बन गया हूँ
फर्न की मन्दिम सरसराहटें और चारों ओर फुसफुसाहटें
सब ओर एक दम ठण्डा, मौत जैसा

नहीं जानता कि हम अब कब मिलेंगे.
तुम प्रार्थना की तरह शान्त और प्रभावशाली थी
एक छाया के रूप में रौशनी से कहीं अधिक चमकदार,
मैं बहरा, मूक, अंधा होने पर भी तुमसे मिल सकता था
लेकिन इस वक्त अदृश्य सा हूँ; अभी तक भीतर से
तुम फिल्म पर टिमटिमाती छवियों की तरह मेरे सामने फ्लैश सी चमकती हो

तुम वास्तविकता हो, लेकिन अब एक सपना बनती जा रही हो
मानो कि हम किशोर कल्पना के कुएं में लौट आये हों
मुझे ईर्ष्या भी होती है, अपने आपसे से पूछता हूं कि
क्या तुम मुझे फिर से चाहोगी? अपने आप से सवाल करता हूं कि
क्या तुम मुझे फिर से पसंद करोगी
या फिर नहीं? बात करोगी?
तुम युवा हो, और क्या मेरी मेरी पत्नी बनी रहोगीं?

मैं आशान्वित हूँ
मानों कि जागृतावस्था में हूँ, उस गड्ढ़े में जहां मैं पहले फिसल गया था
मैं जानता हूँ कि अब भी तुम मेरी पत्नी, मेरी दोस्त, मेरी सहकर्मी हो ...
लेकिन, अफसोस, अब हम इतनी दूर है
क्या लौटना होगा? क्या तुम मुझे छोड़ दोगीं?
तुम्हारे चुम्बन की स्मृति आज भी जिन्दा है

अब धूप खिल गई है, सभी समकदार वस्तुएँ लुप्त हो गईं है
मेरे ऊपर मुझे एक बमवर्षक स्क्वाड्रन के पंख दिखाई देता है
आसमान जो तुम्हारी नीली आँखों का नीलाभ लिए है
बादल छा गए हैं, और मशीन गन गड़गड़ाने लगी है,
बम उछलते हुए अपनी कामनाओं को लिख रहे हैं
इस सबके बावजूद, किसी तरह मैं जीवित हूं।


मिक्लोस रेडनोटी द्वारा अगस्त-सितंबर, 1944 में ज़ागुबिका के ऊपर के पहाड़ों में लेगर हीडेनयू में युद्ध की विभीषिका के दौरान लिखी कविता के दौरान लिखी गई एक कविता ( माइकल आर बर्च द्वारा अंग्रेजी में अनूदित, रति सक्सेना अंग्रेजी से हिन्दी में अनूदित )

( मिक्लोस रेडनोटी द्वारा अगस्त-सितंबर, 1944 में ज़ागुबिका के ऊपर के पहाड़ों में लेगर हीडेनयू में युद्ध की विभीषिका के दौरान लिखी कविता के दौरान लिखी गई एक कविता ( माइकल आर बर्च द्वारा अंग्रेजी में अनूदित, रति सक्सेना अंग्रेजी से हिन्दी में अनूदित )



इस अंक के कलाकार डा सुनीता हैं , जो साहित्यकार, आलोचक और चित्रकार भी हैं।

रति सक्सेना

तृ
     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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