माटी की महक है मंजूषा कला में
 

मंजूषा कला में मिट्टी का महक है। इस लोककला में आपको बच्चों की तुतलाहट नजर आएगी...तो बूढ़ों का अनुभव संसार भी दिखाई पड़ेगा। रंगों का गमित और रेखाओं का ग्रामर इस कला में एक रहस्यलोक बनाता है...और यही वजह है कि सदियों से यह कला लोक को मानव और सर्प के रिश्ते को समझाने की कोशिश करता रही है, लेकिन फिर भी मंजूषा कला को जानने वाले बहुत कम हैं।
इस देश में शायद बहुत कम लोगों को मालूम है कि मंजूषा कला सदियों पुरानी एक ऐसी कला परंपरा है, जिसकी उत्पति बिहुला-बिषहरी की कथा के साथ जोड़कर देखा जाता है। लोकमान्यता है कि बिहुला ने अपने पति बाला के सर्पदंश उपचार के लिए एक नौका तैयार करवाई थी। उसी नौका पर बिहुला अपने पति को नदी के रास्ते से लेकर गई थी। उस नौका को उस समय के कुशल चित्रकार लहसन माली ने अपनी सूझ-बूझ से सजाया था....और लहसन की कला कहलाई थी मंजूषा कला।
आज भी जब बिहुला-बिषहरी की पूजा होती है तो लोग एक मंदिरनुमा आकृति देवी को भेंट करते हैं...जिसे मंजूषा कहते हैं...और उस पर उकेरी गई कला मंजूषा कला । लोक मान्यता है कि जो लोग विषहरी देवी को मंजूषा भेंट चढ़ाते हैं, उन्हें सर्पदंश से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है। ठीक है, लौकिक विश्वास की बैज्ञानिक व्याख्या नहीं की जा सकती,लेकिन रंगों और रेखाओ का एक अदभूत ग्रामर इस कला में देखते को मिलता है...जो मानव और सांप के रिश्ते पर बहुत कुछ कहती है।
जब सारा देश नागपंचमी मना रहा होता है...लगभग उसी समय बिहार के भागलपुर जिले में बिहुला-बिषहरी की पूजा धूम-धाम से होती है। और यही वक्त होता है जब भागलपुर के चंपानगर इलाके के माली कलाकार मंजूषा का निर्माण करते हैं।
मंजूषा एक मंदिरनुमा आकृति होती है...जिसे जूट के पौधे की लकड़ी यानी सनाठी से बनाया जाता है। फिर उस आकृति के चारों ओर कागज चिपकाया जाता है....तब उसपर बनती है मंजूषा कला।
मात्र तीन रंगों से खिलती है ये कला। गुलाबी....पीला...और नीला...और रंग भी होते हैं कच्चे। कूची भी बनती है बांस की करची से। सभी चेहरे एक चश्मीय होते हैं...और रेखाएं बांटती हैं रंगों के इलाके। इस कला में जो कुछ भी बनता है...वो बिहुला और बिषहरी के रिश्ते की कहानी को कला के आईने में दिखाती है। बिषहरी की जिद थी कि वह बिहुला के पति बाला को जिंदा नहीं रहने देगी। उसने ऐसा किया भी। लेकिन बिहुला की जिद ये थी कि वह हर हाल में अपने पति को जिंदा करेगी। दो देवियों की जिद की ये मिथकीय कहानी बाद में बड़ी तेजी से बदलती जाती है। दोनों देवियों में सुलह होती है...बिषहरी देती है बिहुला को आशीर्वाद। बाला को मिलता है जीवन....और लोक को मिलता है मंजूषा कला।
ये कहानी कितनी सच्ची है....नहीं मालूम। लेकिन सच यह है कि सदियों से भागलपुर के लोग बिषहरी को मंजूषा अर्पित करते रहे हैं। सदियों से कलाकार इस कला को नया जीवन देते रहे हैं...जिसमें चक्रवर्ती देवी का नाम आदर से लिया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि चक्रवर्ती देवी ने अपनी पूरी जिंदगी इस कला के उत्थान में लगा दीं। इस कला को उन्होंने अपना धर्म समझा...और बिना किसी की परवाह किए...बिना किसी तरह की अपेक्षा के, यहां तक कि कुछ हद तक उपेक्षा से बचते हुए वे अपनी साधना में लगी रहीं...कला को उन्होंने मजहब बनाया तो लोक ने उन्हें बनाया कला की देवी।
लेकिन आज मंजूषा कला को जानने वाले इस चिंता से जूझ रहे हैं कि चक्रवर्ती देवी के बाद कौन? क्योंकि आज की तारीख में बहुत कम नए माली कलाकारों का इस कला में रूची दिखाई पड़ती है। लेकिन मंजूषा कला...यहां तक कि किसी लोक कला के संदर्भ में यह चिंता जायज नहीं। लोक कला अपने परिवेश की उपज होती है...परिवेश बदलेगा...तो लोक कला में भी बदलाव नजर आएगा। लहसन माली ने जो बनाया होगा...क्या चक्रवर्ती देवी भी वही बना रही हैं? शायद नहीं। लहसन माली ने अपनी आंखों से उस समय के परिवेश को देखते हुए चित्र उकेरे थे। चक्रवर्ती देवी अपने परिवेश से रचनात्मक शक्ति लेती हैं...चक्रवर्ती देवी के बाद जो भी कलाकार इस कला को अपनी साधना में शरीक करेगा...वह कला अपने परिवेश की उपज होगी। समाज बदलेगा...तो लोक कला भी बदलेगी। निरंतर बदलाव लोक कला के लिए एक जरूरी शर्त है....जिस दिन ये शर्त समाप्त हो जाएगी...मंजूषा कला की ताजगी और मासूमियत खत्म हो जाएगी...वक्त भले ही बदलता जाए...मंजूषा कला की कूची खामोश नहीं रहेगी...क्योंकि लोक के विश्वास को अपने साथ लेकर आगे बढ़ती है यह कला।

देव प्रकाश चौधरी
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