अनिल अनलहातु की कविताएँ

ऑगस्ट क्रांति

आज अगस्त की आठ तारीख है
और सुबह के आठ बजे मैं बैठा हूँ
प्लेटफार्म संख्या आठ पर
धनबाद स्टेशन की मुधि पर
जहाँ अमूमन खत्म होता है शहर
और शुरु होता है एक दूसरा शहर |

शहरों से बहिष्कृत
स्त्रीलिंग और पुल्लिंग के बाहर
क्लिवलिंग , जनखे ...किन्नर
सभ्य और सुसंस्कृत लोगों से बाहर
चोर , उठाईगीर, पाकेटमार, बटमार
छोटे-छोटे अपराधों के सजायाफ्ता,
बड़े अधिकारियों और अपराधियों के
शहर से बेदखल बहिष्कृत
यह प्लेटफार्म संख्या आठ है
और सुबह के आठ बज रहे हैं |

आठ बजे सुबह
आठ अगस्त 2013 को
प्लेटफार्म संख्या आठ पर
इकहत्तर वर्षों के बाद भी
न जाने किस भूत / अतीत से डरकर
मेरे बगल में बैठा वर्तमान
हनुमान चालीसा पढ़ रहा है |


फटे-पुराने चीथड़ों में लिपटी
भिखारिन के चेहरे पर
एक अजीब-सी दीप्ती
ममता की चमक है।
गोद में रक्त चूसते
शिशु की ओर निरखते,
हड़ि‌यायी काया और सूखे निचुड़े स्तन।

अहा ! भारतमाता प्लेटफार्म निवासिनी !!
एक डिलीरियम में चीखता
मैं पूछना चाहता हूँ पन्त से
कहाँ है भारतमाता ग्रामवासिनी ??
क्या देश की आज़ादी ने उसे
ग्राम से प्लेटफार्म तक पहुंचा दिया है ?

कमान की तरह झुक गई अर्द्धवृत्ताकार
पीठ वाला एक बूढ़ा आदमी
कृशकाय क्षीण वपु
लाठी( अगर ईश्वर एक लाठी है तो )
का टेक लेकर
एक पाँव से पंजों पर उचकता
पता नहीं कहाँ जा रहा है ?

तीन-चार कुत्तों के बीच गुड़मुड़ियाया सा
पड़ा एक आदमी नींद में
अस्फुट–सा कुछ बुदबुदाता
सोया पड़ा है;

वहां उस ओर
बेतरतीब बढ़े और उलझे
खिचड़ी बालों वाला एक आदमी है
जो लकवाग्रस्त टांग को घसीटता
अनावश्यक रूप से
प्लेटफार्म से कुत्तों को
भगाता जा रहा है ,
उसकी आँखों पर गोल फ्रेम का
चश्मा है और
उसकी नाक के रंध्रों से
खून रिस रहा है ; कौन ?? गांधी !
उठता हूँ मैं पुन: एक डिलिरियम में
और चीखता हूँ कि
क्या उन्हें मालूम है
कि आज आठ अगस्त है ?

हालांकि यह अलग बात है कि
यह आठ अगस्त 2013 है
और वह आठ अगस्त १९४२ था .


नोट :
(1) ऑगस्ट क्रांति - अगस्त क्रांति कम , उपमन्यु चटर्जी के उपन्यास English,August से ज्यादा प्रेरित है

(अनिल अनलहातु की अन्य कविताएं)


रोहित ठाकुर  की कविताएँ
 

द जुलाई मैन

जुलाई में एक आदमी
अपने छाते की मरम्मत करवाता है
वह अपने नये कपड़ों को बक्से में रखता है
और
पुराने कपड़ों को पहनने के लिए बाहर निकालता है
छत के नालों को साफ करता है
नर्सरी से कुछ पौधे लाकर घर के सामने लगाता है
और
उसे बारिश के भरोसे छोड़ता है
जुलाई में एक आदमी हड़बड़ी में
बाजार से ज़रूरत भर का सामान लाता है
एक सस्ता रेनकोट खरीदने की बात
हर जुलाई में एक आदमी करता है |


(रोहित ठाकुर की अन्य कविताएं)


सविता प्रथमेश की कविता


पत्तों का झरना
पत्तों को झरते देखा है
एक ही बार में नहीं झरते हैं पत्ते
धीरे-धीरे खिसकते हैं
झरने की ओर
बिना किसी को बताए
बिना किसी के देखे
बदलने लगते हैं रंग
हंसता-मुस्कुराता चेहरा पीला पड़ जाता है
बिल्कुल आदमी की तरह
मौत को सामने पा
आदमी भी धीरे-धीरे खिसकता जाता है
झरने की ओर
पत्ते की तरह


(सविता प्रथमेश की अन्य कविताएं) 


मीनाक्षी पाटील  की कविता

तू बन
*****

तू शूल बन, त्रिशूल बन,
मत किसी के पैरों की धूल बन

तू शाप बन, अभिशाप बन,

मत किसी के हवस का माप बन

तू रंग बन, तरंग बन
मत किसी की तू पतंग बन

तू रक्त बन, विरक्त बन
मत सुन किसीका, सक्त बन

तू धार बन, तू मार बन
मत किसी के डर से लाचार बन

तू शक्ति बन, तू भक्ति बन
मत रुक अब, आग धग धगती बन


(मीनाक्षी पाटील  की अन्य कविताएं)


आशीष दशोत्तर  की कविता

पिता की घड़ी

पूरे घर में तब एक ही
घड़ी हुआ करती थी,
पिता जिसे हाथ में बांधते और
उसी से शुरू होती थी घर-भर की ज़िन्दगी।
नौकरी पर चले जाते पिता
तो भी घर का वक़्त थमता नहीं
वह उसी तरह चलता रहता।
शाम को घर लौटते ही
सीलन भरी दीवार में हिलती कील पर
पिता टांग देते वह घड़ी।
हम भाई-बहनों के लिए बहुत ख़ास थी वह घड़ी
वही हमें पिता के होने का आभास कराती थी
उसी से शुरू होता था हमारा दिन
और वही तय करती थी हमारे सोने का समय।
रात को पढ़ाई करने उठती बहन अंदाजे से
उस घड़ी में वक़्त देखकर पढ़ती और
अव्वल दर्जे़ में पास होती हर साल।
मां अलसुबह उठकर उसी घड़ी से करती अपने

अनवरत दिन की शुरूआत।
उस एक घड़ी से नियमित था पूरा घर,
आज पिता के गुज़रने के ग्यारह साल बाद
वह घड़ी बंद पड़ी है हमारी यादों की गठरी में
और इधर घर की हर दीवार पर टंगी है
बड़ी-बडी घड़ियां
वक़्त फिर भी हाथ में नहीं है किसी के
ये घड़ियां सोने-जागने,पढ़ने-लिखने का
समय तय नहीं करतीं
ये घड़ियां दीवार की शोभा बढ़ाती हैं
इन घड़ियों से आखिर वह गंध भी नहीं आती
जो आया करती थी पिता की कलाई पर बंधी
घड़ी से,
श्रम से बहे पसीने की गंध।

 

(आशीष दशोत्तर  की अन्य कविताएं)
 


सीमा संगसार  की कविता

सापेक्षता ...
.....................
प्रेम
समय व काल से परे
वह बिन्दु है
जिसके सापेक्ष
डोलती रहती है
पेंडुलम ....

प्रेम में
गुरुत्वाकर्षण
जायज है
लेकिन विपरीत ध्रुवों की दूरी
वक्त के सापेक्ष
विछरन पैदा करती है ...

सुनो काफिर
तुम चाहे जिस भी बिंदु पर
अवस्थित रहो
मैं सापेक्षता के सिद्धांत के तहत
लुढ़कती हुई मिलूंगी

तुम्हारे सापेक्ष ....

कि प्रेम में जीना
एक विचारशून्यता है
जहाँ
क्षोभ , विषाद के पल
और / तर्क
कुछ भी स्थायी नहीं ....

(सीमा संगसार की अन्य कविताएं
)



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