सविता प्रथमेश  की कविता

 
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हाथ बना रहे हैं
सड़क
खुरदुरे काले
हाथ
फटे पैर वाले
हाथ बना रहे हैं
सड़क
काली चमचमाती
चिकनी
सड़क
काश !उसके हाथ -पैर भी चिकने हो जाएं
राजकुमारी सपना देखती है.
कितने सुंदर लगेंगे चिकने चमकीले हाथ
बेजान खुरदुरे हाथों को छोड़ दिया है अपने हाल
कोई हाथ जो नहीं डालने
सुनती है रोज़ ही
सड़क जाएगी
संसद तक
संसद
ये क्या बला है?
पहली बार सुना है
मंदिर?
घर?
अस्पताल?
बाज़ार?
गुड्डू की नाक पोंछते राजकुमारी सोचती है
सब जानते हैं सिवाय उसके ही
हर कोई बात कर रहा है
संसद,संसद,संसद
याद हो गया है उसे यह "शब्द"
संसद तक जाएगी सड़क
ज़रुर कुछ बड़ी जगह होगी
तभी तो सभी जानते हैं
उसे भी हाथ जल्दी चलाना चाहिए
आख़िर संसद तक सड़क का मामला है
ज़रुर "कोई" अच्छी जगह है
तभी तो हर कोई जल्दी कर रहा है
कितना अच्छा शब्द है !
क्यों न गुड्डू का नाम "संसद"रख दे?
बिवाइयों से बहते ख़ून को पोंछते उसने सोचा
कितना अच्छा लगेगा !
खुरदुरे काले-कलूटे हाथ चलने लगे हैं तेज़ी से.
आख़िर संसद तक सड़क का मामला है.
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खानाबदोश


खानाबदोश था आदमी
आरंभ से
यहां से वहां
वहां से यहां
जाता गया
बसता गया
बढ़ता गया
दूर और दूर
अपनी ज़मीं से
अपने आसमां से
समेटता गया दुनिया को
मिलाता रहा अपनी ज़मीं
अपना आसमां
बनाता गया एक दुनिया
नई दुनिया
अपनी दुनिया
सांझी दुनिया
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सबके हिस्से आता है
कोई न कोई
हर कोई होता है
हिस्सा
किसी न किसी का
हिस्सा-हिस्सा मिलकर
मुकम्मल होता है हिस्सा
आकार लेता है रिश्ता
बनती है कोई रचना
हिस्सा-हिस्सा मिलकर
बजता है कोई साज़
हिस्सा-हिस्सा मिलकर
नया हो जाता है हिस्सा
पहले से कुछ और
नहीं मिल पाते कुछ
हिस्से
अपने
हिस्सों से
मुकम्मल नहीं हो पाते
सुर नहीं छिड़ते
रचना नहीं बनती
हिस्से
हिस्से ही रह जाते हैं.
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सविता प्रथमेश
निसर्ग नीड़
11आर.के.रेसीडेंसी
घुरुरोड, तिफरा बिलासपुर छत्तीसगढ़
495001
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परिचय
सविता प्रथमेश
शालेय शिक्षा विभाग में कार्यरत
छुटपुट लेखन और प्रकाशन
 


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