मीनाक्षी पाटील की कविताएँ

 

जो सब करते है, करना है......


मुझे घड़ना है, मुझे बढ़ना है,
जो सब करते है, करना है।

पढ़ना है, चढ़ना है,
सपनो को सच करना है।

भरना है, बहना है,
आशाओं का झरना है।

हसना है, जीना है
पाना है, जो छीना है।

समझना है, समझाना है,
अपनी पहचान बनाना है।

गाना है, गुनगुनाना है,
अपना रंग दिखाना है।

उड़ना है, बिखरना है,
अपनी तेज में निखारना है।

चखना है, परखना है,
प्रगति का रस पीना है।

जीना है, मुझे जीना है,
अब पेट में नही मरना है।

मुझे घड़ना है, मुझे बढ़ना है,
जो सब करते है, करना है।

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देखा है।


दूर समन्दर की उंची लहरों को आस्माँ को छुते देखा है।
हमने अपनी ख्वाइशों को कुछ देर से पूरा होते देखा है।

सारा मेरा प्यार समा पाये ऐसा समन्दर ही कहाँ
सहमी हुई लहरों को सिर्फ पैरों तक आते देखा है।

बहुत दूर जाकर तो गहराई मिल ही जाती है
किनारे पर खडे होकर डूबते, मैने भी देखा है।

कश्ती दूर से आती हुई, नजर आती है मगर,
ठिकाने पर उसे पहुचते हुए, मैंने कहाँ देखा है।

बहती हुई हवा मेरे सवालों को संग ले गयी,
समन्दर का साथ देते हुए मैने उसे देखा है।

तेरी ही तरह बस एक ही जगह पर टिकी रही
सुनहरी धूप को अपने अंचल पर आते देखा है।

जवाब क्या देगी मुझे ये खामोश फिजा।
सफेद चादर ओढे मैने समन्दर को सोते देखा है।


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बाकी है अभी


सारा घर सजाकर देख लिया,
बस किताबों को रखना बाकी है अभी.

लड़ झगड़कर, रोकर रूलाकर देख लिया
उसके साथ खुलकर हसना बाकी है अभी.

आँखोंके दो तारोंको टिमटिमाते देख लिया,
उन्हें चमकते हुए देखना बाकी है अभी.

दिल को हर तरह से बहलाकर देख लिया,
इसे सुच्चाईयोंसे रूबरू करना बाकी है अभी.

बेदर्द जिंदगी को आजमाकर देख लिया,
सुकूने मौत की तारीफ़ करना बाकी है अभी.

 

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