आशीष दशोत्तर
 
आप नज़र में है

आप इस समय नज़र में हैं
सब कुछ क़ैद किया जा रहा है अदृश्य कैमरों में।
आपके हाव-भाव,हरकतें सब कुछ उतर रहा है
उनके रिसीवर पर।


ऐसे नाज़ुक समय में
आप सांस भी सोच-समझ कर लें
कल आपसे आपकी सांसों का हिसाब पूछा जाएगा,
ज़रूरत से ज़्यादा सांस लेने पर
वसूली के तौर पर रोकी जा सकती है उतनी ही सांसें।


आपकी हंसी पर लगाया जा सकता है कोई टैक्स
इसलिए हंसने से पहले दस बार सोचें
खुलकर तो कतई न हंसें
यह हंसी उनके फ़ैसलों के मख़ौल के रूप में दर्ज की जाएगी।
छींकना तो इस वक़्त प्रतिबंधित है
आपकी एक छींक उनके किसी फ़ैसले पर ‘अशुभ‘ मुहर लगा सकती है,
इसलिए छींकना-खांसना सब भूल जाएं
दमे के मरीजों को प्रमाण बताने पर सिर्फ खांसने की छूट दी जाएगी।


बोलने-सुनने की स्थिति में तो आप वैसे भी हैं नहीं
इसलिए व्यर्थ बोलकर अपनी हदें न लांघें।
‘कर मुद्रा‘ ने ‘मुख मुद्रा‘ का व्याकरण वैसी ही बदल दिया है
तो मुंह मचकोड़ कर असहमति जताने का क्या मतलब?
रास्ते अंधकार से भरे हैं
जहां चलने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता ।


ऐसे में आपके लिए यही उचित है कि आप जहां हैं,वहीं रहें
यंत्रवत् सुनते रहें सिर्फ मन की बात
करते रहें इंतज़ार उजले दिनों का।


इसे सलाह माने या चेतावनी
मगर जो भी करें,इतना याद रहे
आप किसी की नज़र में हैं।

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आसमान छूने


(कवि रतन चैहान के लिए)

अस्सी फीट रोड पर
दोनों हाथों को फैलाए चल रहा है कवि
अपने हाथों से संसार की
सारी अच्छाइयों को समेट कर
उनकी झोली में डालने
की कोशिश करते हुए
जिनको नसीब नहीं हो पाए हैं सुख।
अपने वामन पगों से विशाल सड़क
को नापते हुए
वह तय करना चाहता है
उन वंचितों के हिस्से की यात्राएं
जिनकी आंखों से मंज़िल दूर है अब भी।
तालाब की पाल पर बैठकर
वह उन पंछियों के साथ
उड़ने की कोशिश कर रहा है
जो अपने परों से नहीं
हौंसलों से आसमान को छूने निकल पड़ते हैं
हर दिन।

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बागवां चाहता है तो पेड़ों को कटना होगा


बगीचा हरा-भरा तो होगा
मगर बागवां की शर्तों पर।
बागवां चाहता है कि हरे पेड़ों को
काट दिया जाए,
तो पेड़ों को कटना होगा।
पेड़ों की यह दलील मायने नहीं रखेगी कि
उनके हरे होने से है इस बाग की शान
या कि उनके होने से ही आती है समय पर बारिश
या कि उनके होने से ही ठीक रहती है लोगों की सेहत
या कि उनके कारण लिखी जाती है प्रकृति की एक सुंदर कविता
या कि उनके झूमने से ही झूमने लगते हैं असंख्य तन-मन।
बागवां के लिए इन बातों का कोई अर्थ नहीं
वह तो चाहता है अपनी शर्तों पर बाग को हरा-भरा करना।
यहां फूल अपनी मर्जी से खिल तो सकते हैं
मगर उनके मुरझाने का वक़्त बागवां ही तय करेगा।
किस फूल को कब,कहां और कितनी खुश्बू बिखेरना है
इसका फैसला वही देगा।
यदि बाग के पेड़-पौधे कभी चाहें कि
दो घड़ी मिलें, बैठें ,आपस में बतियाएं
अपनी शाखों को कलम बना कर कोई कविता लिखें
कुछ गीत गुनगुनाएं
तो यह बगीचे की लोकतांत्रिक परंपरा का उल्लंघन माना जाएगा।
बागवां जैसा कहेगा सभी को, सभी कुछ वैसा ही करना होगा
जो नहीं करेगा उसे कटना होगा, मुरझाना होगा
या फिर क़ैद होना होगा
अपने ही गुलशन में।


-आशीष दशोत्तर
12/2,कोमल नगर,बरबड़ रोड़
रतलाम-457001
मोबा. 09827084966


 


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