सीमा संगसार की कविताएं
सबसे सर्द रातों की कविता

दो ठिठूरते हाथों में
जब होता है
सूई - तागा
दूनिया की गर्म लिहाफें
तैयार होती है
शयन कक्ष में जाने के लिए ....

जितनी जल्दी चलती हैं सूईयाँ
अपने पथ पर
उतनी ही रोटियां
तय होती हैं
उनकी थलियों में...

रूई धुनता हुआ
वह कोई योगी नहीं
फकीर है
हिन्दुस्तान का
जिनके सहारे
कट जाती हैं
सबसे सर्द रातें
सुकून से ...

शीत की ठिठूरती रातें
कोई कविता है
उनके लिए
जिसके शब्दों को वह
धुनता रहता है
रात - दिन
तपश्चर्या की तरह

और डंडे से पीट - पीट कर
वह करता है
उद्घोषणा
अपने कवि होने का ....
#संगसार

असहमतियां ...
............................
असहमतियां
जो दर्ज होती रही
हर रोज
इतिहास के पन्नों पर
जिन पर उकेरे गए
अनेकों दुख व विषाद
उस काल के ....

उनके तमाम प्रतिरोध
रंग दिए गए
नीली स्याही से
स्याह सुफेद कागजों पर .....

बावजूद कि
हम इंतजार करते रहे
वर्ष के आखिरी महीनों
व आखिरी दिनों तक
उनके तब्दील होते सहमतियों म़े
इश्क की स्याही के लाल हो जाने तक...

डायरियों के
बस एक अंक बदल जाने से
असहमतियों के रंग नहीं बदला करते
कि प्रेम वह आखिरी तिथि है
जिसके अंक न बदलते कभी ....

एक दिसंबर के बीत जाने से
प्रेम नहीं बीता करते
बीतता तो वह समय है
जो हमारे थे ही नहीं कभी
जनवरी खोए हुए प्रेम की पाती है
जिसे लिखा गया हो
प्रेम के आखिरी दिनों में ....


प्रेम ...
........
प्रेम
वक्त के माथे पर
अंकित
वह अंतिम चुंबन है
जिसे देखा जा सकता हो
अतीत के खंडहरों में
आलिंगनबद्ध .....

प्रेम में डूबे हुए पल
वह मीठी नदी है
जिसने छुआ हो
अपने प्रेमी को
उनके देह के किनारे से ...

रातें
प्रेम की सहचरी हैं
प्रेमिका के माथे की
काली बिंदी की तरह ...

प्रेम
क्लांत मन की
गहरी नींद है
व्यथाओं में बीते
कई बोझिल दिनों की तरह ....


पिता का होना


पिता के कंधों पर
झूलते हुए
मैने पाया
एक सुकून
और / उतार दिया मैने
एक लंबी थकान
उनकी आश्वस्त निगाहों में ...

उंघते हुए
उन्होंने पूरी की
टुकड़ों में बंटी अपनी नींद
मेरी हथेलियों पर....

हम दोनों ने जी लिया
एक जिन्दगी
क्षण भर में
बिना कुछ कहे ....
#संगसार

अमूर्त चाहनाएं

हम - तुम
दो ध्रुवों की तरह
आंखों ही आंखों में
झांकते हुए
रहते हैं
आस - पास...

हमारे बीच
बस एक भूमध्य रेखा है
प्रेम की
जिसके पार जाने की
ना कोई जल्दी है
ना कोई अकुलाहट ...

चाहनाएं
अमूर्त होती जा रही हैं
बर्फ की तरह
जिसे छूते ही
वह अदृश्य हो जाए ...

भेङ़ की आंखों में
छुपी है मेरी जान
मेरे सपने बनकर
प्रेम
वह मेमना है
जिसने भय से
बंद नहीं की है
अपनी आंखें अब तक .....

 


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