अनिल अनलहातु  की कविताएं
 


उसका चेहरा

कुछ दूर गए हुए
लोग
फिर से लौट आएंगे ,
मेरे चेहरे को गौर से देखेंगे
और खोजेंगे
उसमे अपना चेहरा
खो चुका होगा जो
कहीं इस बीच ,
क्या तब भी वे
वापस लौट जाएँगे ??
 

चीख के पार

तुम चीखोगे और चिल्लाओगे
कि इसके सिवा तुम
कर ही क्या सकते हो,
और कुछ कर भी सकते हो
तो बस इतना ही
अपने दोस्तों के बीच
गुस्सा सको
और अपनी कमज़ोरियों को
सिद्धांतों और आदर्शों का
जामा पहनाओ।

कि यही वह जगह है
जहाँ लात मार देने से
तुम भुसभुसे दीवार की तरह
भहराकर गिर पड़ोगे।

लेकिन आश्वस्त रहो
कि इस खतरे से
अभी तुम दूर हो
कि तुम्हें लात मारने वाले भी
तुम्हारी ही कमजोरी के शिकार हैं,
कि तुम भी
उन्हीं बुद्धिमान जनखों के अंतर्राष्ट्रीय तबेले
के सदस्य हो |

ऐसा हो सकता है
और है भी ऐसा

की एक समय ऐसा आयेगा,
कि एकाएक तुम्हें
लगने लगे
कि वे तमाम चीज़े
जिनसे तुमने अपनी आस्थाओं
के ड्राइंग-रूम को सजाया था
अचानक ही आउट-डेटेड हो गई हैं,
जो तमाम दुसरे घरों से कबका
उठाकर कूड़ेदानों में डाला जा चूका है ।


हो सकता है तब
तुम फिर चीखोगे , चिल्लाओगे
और धूमिल के अनुसार
अपने ही घूसे पर गिर पड़ोगे |


अथ शुम्भ-निशुम्भोपाख्यान


सहस्राब्दियों के अपमान
और गुस्से को
ढोलक की थाप पर निकालते हुए
हम एक आर्तरुदन में
नाचते हैं।
ढोलक और नगाड़ा पीटते हुए
लेते हैं बदला अपने अपमान का,
जलालत का ।
गुस्से में पीटते चमड़े के ढोल को
औ’
नाचते हैं
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता “।

किन प्राणियों में संस्थित हों देवी
शक्ति रूप में?
क्या विजेताओं की क्रूरता में ?
या घातक विध्वंसक षड्यंत्रकारियों की भुजाओं में ?
ताकि कर सकें सर्वनाश (होलोकास्ट)
एक शांतिप्रिय और अहिंसक सभ्यता की ।

हम दास हैं या दस्यु
या फिर असुर हैं.
राक्षस हैं,
‘दिति’ के पुत्र
देवों के भाई दैत्य हैं.
हम द्रविड़ हैं
अनास हैं
अनार्य हैं ?

अपने ही बंधु-बांधवों की
हत्या करनेवाली देवी की आरती में
नाचते
सुध-बुध खोये
हम कौन हैं?

समाज के बाहर
नगरों से बहिष्कृत
वह ढोल जो हमारे गले में था (१)
कैसी चालाकी हे देवि !
कि वह तेरी आरती में
बजाया जा रहा,
और हम अपने ही पूर्वजों
के हत्यारे की उपासना के
जश्न में नाच रहे हैं !

शहरों–नगरों और सभ्य समाज से
निकाले गए
हम रोमा जिप्सी (२) हैं।
जहां खत्म होता है शहर
और शहर की गंदगी होती है जमा
वहीं कहीं जरायमपेशा झोपड़ियों में
या फिर हार्लेम( ३)
या घेट्टों (३) में ।

न्यूयार्क की काली बस्तियों में
लैंग्स्टन ह्यूज़ के उदास गीतों में
गैर शास्त्रीय और लोक संगीत
और आदिम नृत्यों में
खुद को भुलाए रखा।


अच्छा होता
नष्ट हो गए होते हम
“इंकाओं” (४)की तरह
‘मय”(४) की तरह
या फिर
‘रेड इंडियनों”(४) की तरह
‘एजटेक’(४) की तरह
हम, हम न होते
हम वही होते , जो हम न होते
हम वही होते, जो वे चाहते ।

अच्छा होता बेबीलोन नष्ट हो गया होता
दजला-फुरात नदियाँ सुख जातीं,
अवश गुलामी की चरम परवशता
जब ‘हम्मूराबी’(५ ) भी मैं हूँ
मुद्दई भी मैं ही हूँ
मुद्दालेह भी मैं हूँ
जज की कुर्सी पर
मैं(६) ही आसीन हूँ ;
जिरह मैं ही करूंगा
और खुद को सज़ा ( -ए-मौत ) भी
मैं ही दूंगा।
किस कसूर का
मालूम नहीं;
क्योंकि मैं एक द्रविड़ हूँ
और रावण भी द्रविड़ था, एक राक्षस था
और साथ ही वह एक ब्राह्मण भी है,
एक (विश्रवा) मुनि का पुत्र है
और परम ज्ञानी है,
और तुम उसे मारते हो
और मरते हुए रावण से शिक्षा लेते हो ।

और हम ... (हम रावण के वंशज)
रावण के पुतले में आग लगाते है
औ’ नाचते हैं
कमजोर और निष्कपट पर
षड्यंत्र और धूर्तता और चालाकी की जीत
‘“या देवि ! सर्वभूतेषु हत्यारी रूपेण संस्थिता ,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः.”
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नोट:
१.) चीनी यात्री ह्वेनसांग ने (हर्षवर्धन के राज्य काल में) अपने भारत भ्रमण पर लिखे पुस्तक में यह जिक्र किया है की शूद्रों को शहर के बाहर रखा जाता था एवं उनके गले एक ढोल लटका हुआ रहता था जिसे उन्हें शहर में प्रवेश करते समय पीटते रहना पड़ता था ताकि सवर्ण उनकी पपरछाईयों से बच सकें.


२.) रोमा जिप्सी : पूरे विश्व में फैले रोमा जिप्सियों को भी जरायमपेशा जाति माना जाता है तथा उन्हें शहरों से बाहर रखा जाता है . रोमा जिप्सियों को भारतीय डम जाति से जोड़ा जाता है जो ईसा की दूसरी- तीसरी शताब्दी में भारत से बाहर निकले और पूरे विश्व में फैल गए. दक्षिण फ़्रांस में रोमा जिप्सियों ने एक मंदिर के स्थापत्य में “काली” की प्रतिमा रखी है जिसका रंग बिलकुल काला है, जिसे वे “सारा-ए-काली” कहतें हैं..


३.) हार्लेम, घेट्टो – अफ़्रीकी नीग्रो लोगो की बस्तियां


४.) इंका, मय, एजटेक, रेड इन्डियन – लैटिन अमेरिकी सभ्यताएं जिन्हें साम्राज्यवादी यूरोपियन्स ने अपने लोभ एवं लालच में नष्ट कर दिया.


५.) हम्मुराबी : ईसा पूर्व 1792 से ईसा पूर्व 1750 तक बेबीलोन(आधुनिक ईराक) पर राज करनेवाला राजा जिसने विश्व को पहली बार लिखित कानून दिया, जिसे “हम्मुराबी संहिता” या हम्मुराबी कोड कहते है.


६.) जार्ज बुश ने कहा था की सद्दाम हुसैन को सज़ा देने के लिए अमेरिकी जजों की जगह इराकी जजों की नियुक्ति होगी तथा वे ही फैसला देंगे.
***4***
 अनिल अनलहातु

प्रकाशन - ‘ बाबरी मस्जिद तथा अन्य कविताएँ ’, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन से प्रकाशित सौ से ज्यादा कवितायें, वैचारिक लेख, समीक्षाएं एवं आलोचनात्मक लेख हंस,कथादेश,वागर्थ,नया ज्ञानोदय, वर्तमान साहित्य ,समकालीन सरोकार,पब्लिक अजेंडा,परिकथा,उर्वशी, समकालीन सृजन,हमारा भारत,निष्कर्ष,मुहीम,अनलहक, माटी,आवाज़, कतार, रेवांत,पाखी, ,कृति ओर, चिंतन-दिशा, शिराज़ा, प्रभात खबर,हिंदुस्तान,दैनिक भास्कर आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. पुरस्कार - ‘ बाबरी मस्जिद तथा अन्य कविताएँ ’ कविता संग्रह पर "साहित्य शिल्पी पुरस्कार,2018" । ‘प्रतिलिपि कविता सम्मान, 2015”. “कल के लिए” पत्रिका द्वारा “मुक्तिबोध स्मृति कविता पुरस्कार”, अखिल भारतीय हिंदी सेवी संस्थान, इलाहबाद द्वारा “राष्ट्रभाषा गौरव“ पुरस्कार. आई.आई.टी. कानपुर द्वारा हिंदी में वैज्ञानिक लेखन पुरस्कार संप्रति - एक सरकारी उपक्रम में महाप्रबंधक | पता - c/o ए.के. सिंह, फ्लैट नं. - जी-6 ( G - 6), भुवनेश्वरी रेसिडेंसी अपार्टमेंट, पंडित क्लीनिक के सामने, बरटाँड़, धनबाद, झारखंड - 826001। मोबाईल नम्बर : 08986878504, 09431191742,
 


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