रंजीता सिंह फ़लक की कविताएं
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मौन


तुमने
जब से
मेरा बोलना
बन्द किया है

देखो ना
मेरा मौन
कितना चीखने लगा है
.गूँजने लगी है
मेरी असहमति
और
चोटिल हो रहा है
तुम्हारा दर्प .....|

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देवता

मैंने
तुम्हारी मनुष्यता से
प्रेम किया
और
तुम मुझे
देव से लगने लगे

मेरे प्रेम ने की
तुम्हारी अराधना
और
तुम खुद को देवता मान
आजमाने लगे
मुझी पर
सर्जना और विनाश के नियम |

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औरतों के दुख

औरतों के दुख
बड़े अशुभ होते हैं
और उनका रोना
और भी बड़ा
अपशकुन |

दादी शाम को
घर के आंगन में
लगी मजलिस में
बैठी तमाम बुआ ,चाची ,दीदी ,भाभी
और बाई से लेकर हजामिन तक की
पूरी की पूरी
टोली को सुनाती
औरतों के सुख और दुख का इतिहास |

समझाती सबर करना
अपने भाग्य पर कि
विधि का लेखा कौन टाले
जो होता है
अच्छे के लिए होता है |

सुनी थी उसने
अपने मायके में कभी
भगवत कथा
थोड़ा बहुत पढा
रामायण और गीता भी
फिर पढ़ने से ज्यादा सुनने लगी
क्योंकि
ज्यादा पढ़ लेने से
बुद्धि खराब हो जाती है ,
मर्दों की नहीँ
पर औरतों की |

पूछा था उसने भी
कभी अपनी दादी से
कि ज्यादा पढ़ के खाली औरतों की हीं
बुद्धि ही क्यो खराब हो जाती है ?
मर्दों की काहे नहीं ,
तभी डपट के खिंचे गए थे कान
और फूँका गया था
एक मंत्र ,
औरतों को नहीँ पूछने चाहिए
कोई सवाल
ज़िन्दगी खराब होती है l

नहीं पूछने चाहिए
'क 'से शुरू होता
कोई भी प्रश्न
जैसे ..
क्यो गए ?
कहाँ गए ?
क्यो नहीँ बताया ?
कब आओगे ?
आदि -आदि !

ऐसे हर सवाल से लगती है
अच्छे भले घर में आग

औरत को मुंह बन्द
और
दिमाग खाली रखना चाहिए
इससे होती है बरकत
बसता है सुखी संसार
आते हैं देव ,
विराजती है लक्ष्मी |

बन्द रखो
दिमाग के सांकल
सारे सवाल मन के ताल में
ड़ूबो दो
सारी शिकायतें
दिमाग की देहरी पर
छोड़ दो
और हाँ ,
मन की कुन्डी भी लगा लिया करो
जोर से |

नहीं सुनना
सपनों की कोई
आहट
सफेद रखो
मन की स्लेट
नहीं खींचो
कोई तस्वीर

और कभी
किसी अभागी रात , जो देख लो
कौई चेहरा
तो तुरंत मिटा दो |

हमेशा
कोरी रहनी चाहिए
औरतों के मन की स्लेट |

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होना अपने साथ

पीले पत्तों से
बीमार दिन में भी
हरे सपने
आकर टंग जाते हैं
मन की सुखती सी
खुरदुरी डाल पर
और वहीं ख्वाहिशों की
छोटी सी गौरया
फुदकती है
चोंच मारती है ..
सपनों के अधपके फलों पर

वहीं नीले से दिन की
आसमानी कमीज पहने
निकलता है कोई
तेज धूप में

सच का आईना
एकदम से चमकता है
और चुभते हैं
कई अक्स माज़ी के
और नीला दिन
तब्दील हो जाता है
सुनहरी सुर्ख शाम में

कुछ रातरानी और
हरसिंगार
अंजुरी भर लिये
ठिठकता है
वक्त का एक छोटा सा
हसीं लम्हा
और एकदम उसी पल
खिल उठता है पूरा चाँद
किसी याद सा

देखती हूँ
दूर तक पसरती
स्याह रात
तुम्हारी बाँहों की तरह

बीमार पीले पत्तों से दिन
हो जाते हैं
दुधिया चाँदनी रात

सच हीं है
उम्मीदें बाँझ नहीँ होती
वे जन्मती रहती हैं
सपने
उम्मीद खत्म होने की
आखिरी मियाद तक

ठीक वैसे
जैसे जनती है
कोई स्त्री
अपना पहला बच्चा
रजोवृति के आखिरी सोपान पर |
साहित्यिक पत्रिका 'कविकुंभ' की संपादक। चर्चित काव्य-संग्रह - 'प्रेम में पड़े रहना', साक्षात्कार संकलन - 'शब्दशः कविकुंभ',"कविता की प्रार्थनासभा " में कविताओं पर चर्चा । देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्पेशल न्यूज, परिचर्या, रिपोर्ताज, कविता ,गीत-ग़जलों का प्रकाशन। स्त्री-पक्षधर संगठन 'बीइंग वुमन' की अध्यक्ष। शायरा, लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता। अस्थायी निवास- सिरमौर मार्ग, कौलागढ़ रोड, देहरादून (उत्तराखंड) 248001, संपर्क - 920518567 / 9548181083
 

 


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