Tenzin Tsundue की कविता

जब धर्मसाला में बारिश होती है.

जब धर्मसाला में बारिश होती है
बारिश की बूँदें बॉक्सिंग ग्लव्ज़ पहन लेती हैं
हज़ारों की संख्या में
वे मेरे कमरे पर बरसती हैं
और इसे पीटने लगतीं हैं बे तरह
अपनी टीन की छत के नीचे
मेरा कमरा भीतर से रोता है
और भिगो देता है मेरे कागज़ों को
मेरे बिस्तर को.

कभी कभी एक चालाक बारिश
आती है पिछवाड़े से

गद्दार दीवारें अपनी एड़ियाँ उठाती हैं
और एक छोटी सी बाढ़ को भीतर आने दे देती है
मैं अपने बिस्तर के टापू पर बैठ कर
अपने बाढ़ग्रस्त देश को देखता हूँ

आज़ादी पर नोट्स
जेल के संस्मरण
कॉलेज के दोस्तों की चिट्ठियाँ
ब्रेड के टुकड़े
और मैगी नूडल्ज़
सतह पर तिर आते हैं सहसा
मानो समृतिपटल पर कुछ भूली बिसरी यादें.

तीन यंत्रणा भरे महीने
मॉनसून के
सूई की नोक जैसे पत्तियों वाले चीड़वन
स्वच्छ धुला हुआ हिमालय
चमकता है शाम की धूप में.

जब तक कि थम नहीं जाती बारिश
और मेरे कमरे पर बरसना नहीं छोड़ देती
मुझे अपने टीन छत को सांत्वना देनी है
जो अपनी ड्यूटी बजा रहा है
ब्रिटिश राज से ले कर अब तक
इस कमरे ने अनेक बेघरों को शरण दी है
पर अब इस पर नेवलों, चूहों, छिपकलियों
और मकड़ियों का कब्ज़ा है
जिस के एक हिस्से का मैं किराएदार हूँ

घर की जगह एक किराए का कमरा
जिस के अस्तित्व पर तुम तरस खा सकते हो
मेरी कश्मीरी मकान मालकिन
अस्सी बरस की उम्र में
घर नहीं लौट सकती
अक्सर हम तुलना करते हैं
कौन सुन्दर
काश्मीर या तिब्बत ?

हर शाम
मैं अपने किराए के कमरे मैं लौटता हूँ

पर मैं इस तरह मरना नहीं चाहता
कहीं न कहीं
कोई रास्ता होना चाहिए

मै अपने कमरे की तरह नहीं रो सकता
मैं बहुत रो चुका

जेल में
हताशा के छोटे छोटे क्षणों में

कहीं न कहीं
कोई रास्ता होना चाहिए

मैं रोना नहीं चाहता
मेरा कमरा काफी भीग चुका है.

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पेड्रो की बाँसुरी

पेड्रो, पेड्रो
तुम्हारी इस बाँसुरी में क्या है?
क्या इस में एक छोटा सा बच्चा है,
जिस की माँ खो गई है
और जो दौड़ रहा शहर भर में
गीले पत्थरों के फर्श पर अपने पैर चटकाता ?

पेड्रो, पेड्रो
तुम्हारी इस नली में क्या है
क्या इस में एक मद्धम विलाप है
सोलह साल की उम्र में गर्भवती हुई लड़की का ?
जो घर से बाहर फैंक दी गई
और शौचालय के पिछवाड़े
सार्वजनिक पार्क में रहती है .

हैरान होता हूँ
कि कैसे बजा लेते हो
तुम उस प्लास्टिक की नली को
और कैसे ज़िन्दा हो जाती है यह् बाँसुरी
बिना आँख, बिना कान, बिना मुँह
सीटी बजाती
कभी चीखती , कभी गाती

सीटियाँ सूई जैसी तीरों में बदल जाती
तीर जो डंक मारते हैं
यहाँ तक कि उल्लुओं के दिलों को भी
उल्लू, जिन के कान में बाल हैं.

पेड्रो, पेड्रो
बताओ तुम्हारी बाँसुरी में क्या है
क्या इस की सीटी
खिड़की के कब्ज़ों में एक लड़की की चीख है?
या कि एक बच्चे की साँस की आवाज़ें हैं
जो थक कर सो रहा है पुलिस थाने में

पेड्रो, पेड्रो
बताओ तुम्हारी बाँसुरी में क्या है ?

3. लोसर की शुभ कामनाएं

टशि देलेग !
खूब अच्छे से फूलो फलो मेरी बहना
यद्यपि एक उधार के बगीचे में .
इस लोसर पर
जब तुम सुबह की प्रार्थना पर होगी
एक दुआ फालतू माँग लेना
कि अगला लोसर हम ल्हासा में मनाएं

जब तुम कक्षा में होगी
एक पाठ फालतू पढ़ लेना
कि तुम तिब्बत जा कर बच्चों को पढ़ाओगी

पिछले वर्ष लोसर पर
नाश्ते पर मैं ने इडली –साँभर खाया
और स्नातक तृतीय वर्ष की परीक्षा दी
मेरे डाँतेदार इस्पाती फोर्क पर
इडलियाँ ठीक से टिकती नहीं थीं
पर मैंने अपने अपने पेपर ठीक से लिख लिए.

तुम खूब अच्छे से फूलो फलो बहना
अपनी जड़ें उतारो
ईंट , पत्थर, टाईल और रेत में
खूब फैलाओ अपनी टहनियाँ
और मुडेरों पर ऊँचा उठो.

4, गद्दारी

मेरे पिता मर गए थे
मेरे घर की रक्षा करते हुए
मेरे गाँव और मेरे देश की रक्षा करते हुए
मैं भी लड़ना चाहता था
पर हम बौद्ध हैं
लोग कहते हैं
हमें शांत और अहिंसक होना चाहिए

और मैं माफ कर देता हूँ अपने शत्रु को
पर कभी लगता है मुझे
कि मैंने अपने पिता के साथ
गद्दारी की
.


Tenzin Tsundue-Former political prisoner who survived torture and humiliation in Tibet under Chinese occupation is a poet and independence activist born and raised in India . A leader in the Tibetan struggle, Tenzin Tsundue is a post graduate from Bombay University in literature and philosophy. As a university student he published his first book of poems with money begged and borrowed from his classmates. Tsundue continues to publish his books himself and makes a living out it by peddling poetry. His second book Kora is in its sixth edition selling more than 15,000 copies and his third book Semshook is in its third edition. He won the first "Outlook-Picador Non-fiction Contest 2001". Tsundue is widely published in national and international media, and anthologized. As a poet he represented Tibet in the Second South Asian Literary Conference in New Delhi in 2005 organized by Sahitya Akademi, Poetry Africa 2005 in Durban and KATHA Asia International Utsav 2006, New Delhi . Some of his writings are published online at: www.TibetWrites.org

 


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