हेलेन दावर की कविता ( HELEN DWYER)
 

यह कमरा

इस कमरे से कुछ दिखाई नहीं देता
रातें बीते हुए दिनों सी लगती हैं
वे युद्ध से लौटे हुए घायल सैनिकों की तरह
दीमाग की ओर मार्च करती आती हैं
थकी, खून से लथपथ, परेशान सी

इस अंधेरे बन्द कमरे में
बीता वक्त पास लेटा है
भविष्य किसी ओर के लिए है
हर दिन भूखे कुत्ते सा
तुम्हारी हड्डियाँ चिंचोड़ता है।

इस बन्द कमरे में
शर्म अपने आप का हवाला देती है
घबराए कदमों से
बदनामी प्रवेश करती है
उस हर चीज के साथ, जो तुम कर नहीं सकते
बाहर, वे बरसात में चहलकदमी कर रहे हैं
होमवार्ड बसों में ऊँघ रहे हैं
बिना यह जानते हुए कि
वे कितने भाग्यशाली हैं।


स्रेब्रेनिका के बाद

वे अपनी बन्दूकें तुम्हारी ओर तानते हैं
और तुम्हे जाने को कहते हैं

तुम्हारी देह कहना मानती है
लेकिन दीमाग चिल्ला उठता है
नहीं, मेरी कोई गल्ती नहीं
मैंने कुछ नहीं किया
मैं सोलह बरस का हूँ
और यह मेरा घर है

तुम्हारे पास कोई हथियार नहीं
छिपाने के लिए कोई जगह भी नहीं
तुम जबरदस्ती उस खेत की ओर
हाँके जाते हो, जहाँ कभी तुम खेले थे

सारे कि सारे गाँव के लड़के, मर्द
संयुक्त कब्र में चले गए

अब यू एन के पुरातत्वियों ने
तुम लोगो का डी एन ए खोज निकाला
जिससे अलग कब्र में रखे जा सको

इतने बरसों के इंतजार के बाद
अब तुम्हारी माँ समझ पाती है कि
तुम फिर कभी उसकी बाहों में
नही लौट कर आओगे
धूप से फीके लिए बालों और
त्वचा में गरमी की खुशबू लिए

हमेशा के लिए चले गए
गाँव के बच्चों और मर्दों की तरह

रात को जब वह पीड़ा के मारे सो नहीं पाती
वह आसमान की ओर तुम्हारा नाम पुकारती है
और महसूस करती है, जो तुम्हारी निर्दोष आँखों ने
बन्द होने से पहले आखिरी बार देखा था
क्या मरते वक्त
उसका नाम तुम्हारे होठों पर था?

स्वर्ग भी उसकी मदद नहीं कर सकता
ना ही स्रेब्रेनिका की सारी औरते या लड़कियाँ
जो अभी तक अपने आँसुओं के संसार में डूबीं हैं।


अंग्रेजी से अनुवाद - रति सक्सेना
हेलन दावर आइरिश कवि हैं। उनकी प्रस्तुत कविताएँ आत्मिक वेदना और सम्बन्धों के सत्यों को दर्शाती हैं।
 


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