कमलाकांत त्रिपाठी

वरिष्ठ कवि, कथाकार और लेखक, चिन्तक

वह पल

संगम की वह भीगी बालू
मटमैले पानी पर तिरते वे फूल
किनारे की धूप-अगरबत्ती
और स्नान के बाद
छिपने को आतुर तुम्हारी देहयष्टि
अपरिचित नज़रों के अवांक्षित दबाव से.

और उन सब के बीच
आँखों से झाँकती
विश्वास की वह चमक
फूटती कहीं भीतर से

भर गया था वह पल
काँपती धूप-सा
माघ की बदली से छिटककर
भीतर मेरे.

तुम वही पल हो
दुबका हुआ भीतर
चिर युवा
और कोना भी वह मेरा
सँजोए उस पल को, चिर युवा.

प्रवेश नहीं देवलोक में हमारा, हम जानते हैं
गिला नहीं कोई.
स्मृति को व्यापती है जरा कहाँ.
और चलेगी मृत्यु भी
माघ की नि:शक्त धूप में काँपते
उसी पल के साथ.
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यात्रा के अंत में

याद नहीं होते रास्ते के मोड़
यात्रा के अंत में
पर याद होती हैं तालाब की वे टूटी सीढ़ियाँ
जिन पर अबेर में बैठकर
धूल-सने बच्चे की पीठ मलती माँ
जबरन उसे नहला रही होती है.


याद होते हैं वे मेड़ जिन पर अपने से दूना बोझ उठाए बच्चे
चलते-चलते ठिठककर जाने क्या देखने लगते हैं हममें.
हरी-उमड़ी फ़सल के बीच झुकी वह लड़की
जो हमें देखकर औचक खड़ी हो जाती है
मालूम नहीं होता क्या है उसकी उस साफ़ धुली नज़र में
कैसा डर और कैसा दर्द और कैसा सपना
दुनिया के किस कोने में कैसी ज़िंदगी इंतज़ार कर रही है उसका ?


याद होती हैं पेड़ों के झुरमुट से झाँकती वे झोपड़ियाँ भी
जिनके इर्द-गिर्द की ज़मीन
खूँटे से बँधी पगुराती गायों, भैंसों, बकरियों
नटखट चूजों के झुंड सँभालती मुर्गियों
और कटोरे में भात खाते नंग-धड़ंग बच्चों से
चितकबरी रँगी होती है.


जल्द ही गुम हो जाते हैं वे जिनके साथ हम सफ़र करते हैं
लेकिन रह जाते हैं वे जिनके बीच से हम सर्राटे से निकल आते हैं
और रह जाते हैं ढेरों सवाल जो वो कभी किसी से नहीं पूछते.


यात्रा के अंत में हम वहाँ नहीं होते जहाँ से चले होते हैं.
और वह भी नहीं होते जो चले होते हैं.
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आदमी और शहर

शहर होते हैं बूढ़े
आदमी की तरह
सूख जाते हैं बगीचे
उग आती हैं झाड़ियाँ बदरंग
बजबजाती हैं गलियाँ
बंद हो जाती हैं एक दिन
बँगले ढह जाते हैं
घास फैलती है चौबारों में
जंगली, बेतरतीब
टूटी मुड़ेर पर बैठी चील देखती है
सब कुछ निर्विकार
और बैठी रहती है वैसे ही जाने क्या सोचती
नदी छोड़ जाती है रेत
हवा में काँपती, उड़ती बगूलों में
एक खौराया कुत्ता मरगिल्ला
ठहरकर ताकता है बेहिस निगाहों से
फिर चल पड़ता है निरुद्देश्य
हँसते-खिलखिलाते चेहरे पककर चिटक जाते हैं एक दिन
हो जाते हैं झुर्रियों में तब्दील
रहते हैं स्मृति में वैसे ही फिर भी
जैसे था शहर कभी
धुला-धुला बारिश में गहगहाता
………………………..

स्वप्न और ज़िंदगी.

कम आते हैं
पर आते हैं कभी-कभी
स्वप्न ऐसे विचित्र
दृश्य से अधिक होता है अदृश्य
साकार से अधिक निराकार
तना हुआ वितान अलौकिक, अज्ञेय
एक दिव्य-सा सन्नाटा
खिंचा हुआ आरपार
ऊभ-चूभ सौंदर्य
अबूझ अमूर्त का.

साफ़ नहीं होता
क्या है उत्स, क्या है उपादान.
कौन-सी जगह, कौन-सा लोक.
कौन-सा काल और कौन-सी उम्र
बस करता है स्तब्ध, आलोडित, आविष्ट.
और आँखें खुलने, न खुलने की संधि पर
ढलक पड़ते हैं दो बूंद
जाने कैसे उत्ताप में
कोरों पर
स्वप्न का एकमात्र हासिल
मूर्त और ऐंद्रिक.

सम्मोहन नहीं जाता
देर तक जगते हुए
और तड़पते हुए
मछली की तरह
पानी में लौटने के लिए.

फिर खुलती हैं यादें
विरल, भूली-अधभूली
दूर अतीत की
उस दुनिया की
जो मिट गई
आरती शुरू होने से पहले ही
जल चुके कपूर-सी.

उस यात्रा की जो
गाढ़े होते अँधेरे के आतंक में
धूल-भरी, टेढ़ी-मेढ़ी, अनजान डगर पर
घुप, स्याह रात उतरने तक
नहीं हो सकी पूरी.

उस प्रेम की
जो आँखों से उतरकर
न पहुँच सका कभी
होंठों तक.
उस सब की जो हो सकता था और नहीं हुआ.

और तब खूब घिरकर फूटती है रुलाई
ऐसी कि
स्वप्न और सम्मोहन
और कायनात यादों की
और वह कसक चीज़ों के होते-होते न होने की
डूबकर डब्भ हो जाएँ सब एक साथ.

आते हैं
ऐसे भी स्वप्न आते हैं
उद्दीप्त
और ऐसी ज़िंदगी में
बुझी-बुझी
खंडित-विखंडित.
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सचमुच कहाँ होगा वह कवि ?*

होगी कोई बहुत उदात्त चीज़
बहुत प्रातिभ, बहुत पवित्र, बहुत अतींद्रिय
जिसे कहते हैं कविता.

अटूट होगा समर्पण कवि का
अपने मूल्यों और स्वप्नों के प्रति
निश्चय ही होगा वह दुनियादारी से मुक्त
जोड़-तोड़, उठा-पटक, छल-छद्म,
जुगाड़ और दुनियावी सफलता
से ग़ाफ़िल.

मनुष्य की चिंता में डूबा अहर्निश
एक विशिष्ट, कुछ-कुछ रहस्यमय-सा
जीवन में उतारता अपने मूल्यों
और स्वप्नों को भरपूर,
वह मनुष्य
जिसे कहते हैं कवि.

निश्चय ही नहीं लिखता होगा कविता वह
नाम और यश और चर्चा और पुरस्कार के लिए
जिनसे नहीं होता रंचमात्र भी
मनुष्य का निस्तार.

मनुष्य और उसके निस्तार की फ़िक्र में डूबा
हमेशा उत्तप्त और उद्विग्न
कैसे होगा हँसता-खिलखिलाता,
प्रेम और संभोग का
लुत्फ़ उठाता
वह विशिष्ट जिसे कहते हैं कवि ?

कथनी और करनी के द्वैध से मुक्त
सरल, बेबाक और अनुकरणीय
मूल्यों और प्रतिबद्धताओं को
जीता अपने जीवन में

कहाँ होगा
वह विशिष्ट, बेहतर मनुष्य
सचमुच कहाँ होगा वह कवि ?
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*प्लेटो (रिपब्लिक, दसवीं किताब) के अनुसार कवि-कलाकार सत्य से तीन डिग्री दूर होता है—सत्य की नक़ल की नक़ल की नक़ल करता है। वह भी मनमानी।

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