मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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शब्दों से मेरी दोस्ती उतनी ही पुरानी है जितनी कि मेरी याददाश्त, बचपन के उन पलों में जब मैंने अपने को बेहद अकेला पाया , मेरी मुट्ठी में कुछ शब्द हमेशा फड़फड़ाते। मुट्ठी खोलते ही वे जुगनु की तरह आसमान में फड़फड़ाते चले जाते। मैं उन्हें दूर जाते देखती फिर दुखी होती कि मैँने मुट्ठी खोली ही क्यों, फिर सोचती कि यदि मुट्ठी नहीं खोली होती तो जुगुनुओं की चमक से जो वंचित रह जाती। मुझे आजतक भी पता नहीं चला है कि मैं शब्द देखती थी या चित्र? कहते हैं कि हम शब्दों को चित्र के रूप में देखते हैं, लेकिन चित्र तो मन में अंकित छवि के आधार पर ही बना करते होंगे ना! मेरा मन तो ना जाने कब से अनजानी आकृतियों से दोस्ती कर बैठा है।
रति सक्सेना
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*
रिश्ते की धूप यह
जीवन के पोर-पोर को
नहला रही है ऐसे
पवित्रता इससे अलग
कुछ और होती ही नहीं जैसे।
अपने हिस्से का
सब कुछ समर्पित तुझे यों
जीवन का अपना ताग हरेक
तेरे लिए ही तो मैंने बुना है ज्यों।

रजत कृष्ण
+
पर्यावरण दिवस पर
झाँकियाँ निकलती हैं
तस्वीरों की
प्रिंट और सोशल मीडिया में
पौधरोपण करते हुए लोगों की
तस्वीर एक समय की यात्रा है
एक औरत पेड़ से चिपकी
समय की आरी ने कितनी औरतें काटीं
देह से विदेह किया जाना भी बलात्कार ही है

सिमन्तिनी रमेश वेलुस्कर
+
सड़कों की धूल
मेरे नाखूनों में
सड़कों की धूल
मेरी पलकों के नीचे
सड़कों की धूल
मेरी जीभ के नीचे
सड़कों की धूल
मेरी त्वचा के भीतर
Triin Soomets
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1
ये मेड़
ये sक्यारियां
मेरी नसें हैं
ओ गुरु ..
मेरी नसों में
ये पत्थर सनसनाने दो

2.
पत्थर पर उगी कँटीली झाड़ी से प्यार जताकर
हमने खेतों की रखवाली की है
सियारों की हुआँ हुआँ ने
हमारा हृदय झपट लिया है
उनको लगता है
वो जीत जाएंगे
पता नहीं
कहाँ से, कैसे
ये भीख की लूट
भवितव्य बनती है

3.
खेतों की मेड़ों पर
मैंने सांझ रंगी
मन की मेड़ों पर
मैंने रातें सजाईं
और तुमने
दूर रहकर
मेरी खिल्ली उड़ाई

4.
मेरी जड़ें हैं
यदि मुझे
सबका सब
कोई काटे
तब भी मुझे
डर नहीं लगता
जितने मेरे
टुकड़े होंगे
उतने गुना
मैं बढ़ता जाऊँगा

रमेश भगवंत वेलुस्कर


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संगम की वह भीगी बालू
मटमैले पानी पर तिरते वे फूल
किनारे की धूप-अगरबत्ती
और स्नान के बाद
छिपने को आतुर तुम्हारी देहयष्टि
अपरिचित नज़रों के अवांक्षित दबाव से.

और उन सब के बीच
आँखों से झाँकती
विश्वास की वह चमक
फूटती कहीं भीतर से

भर गया था वह पल
काँपती धूप-सा
माघ की बदली से छिटककर
भीतर मेरे.

तुम वही पल हो
दुबका हुआ भीतर
चिर युवा
और कोना भी वह मेरा
सँजोए उस पल को, चिर युवा.

प्रवेश नहीं देवलोक में हमारा, हम जानते हैं
गिला नहीं कोई.
स्मृति को व्यापती है जरा कहाँ.
और चलेगी मृत्यु भी
माघ की नि:शक्त धूप में काँपते
उसी पल के साथ.

+
होगी कोई बहुत उदात्त चीज़
बहुत प्रातिभ, बहुत पवित्र, बहुत अतींद्रिय
जिसे कहते हैं कविता.

कमलाकांत त्रिपाठी
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'ख़लील जिब्रान
शिव प्रकाश गौड़ जी द्वारा अनूदिन
फूल का परिचय-

मैं लफ़्ज़ मेहरबाँ क़ुदरत के ख़ज़ाने से बरसा ज़मीं पर,
मैं चमकता सितारा फ़लक का उतारा ज़मीं पर ।
पंच पुर्ज़ों और ख़िज़ाँ के मेल से बना बीज मैं,
बसंत ने दी ताक़त ज़मीं फोड़ निकल पड़ा मैं ।
तेज़ धूप हो या वर्षा भारी तन कर खड़ा रहा मैं,
गर्मी और वर्षा में ही पला और बड़ा हुआ मैं ।
हल्की सर्दियों में रहूं खुश ख़िलाखिला मैं ,
भारी ठंड में क्यारियों में सोने चला जाऊं मैं ।
भोर-हवा संग मैं खिलता सूरज के स्वागत में,
शाम को विदाई गाता मैं बे-आवाज़ परिंदों के शोर में ।
मेरी ख़ुशबू हवा में चारों ओर इत्र घोलती तैरती,
मेरे रंगों की चूनर ओढ़ पहाड़-मैदान दुल्हन दिखती ।
जब मैं सोता, रात की आँखें रखवाली करतीं,
 
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VOL - X/ ISSUE-Xi

मार्च -अप्रेल 2021

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

 

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