मेरी नसों में ये पत्थर सनसनाने दो -रमेश भगवंत वेलुस्कर, कोंकणी

 

रमेश भगवंत वेलुस्कर, कोंकणी के कवि, चिन्तक लेखक, और यायावर, जिनसे मेरी मुलाकात एक यायावरी के दौरान ही हुई थी। अपनी भाषा और उसकी जीवन के लिये, जिन्होंने अपने अनेक साल खपा दिये। साहित्य अकादमी के अवार्ड से सम्मानित रमेश जी का व्यक्तित्व दुर्लभ था। कैंसर के कारण दुनिया छोड़ गये, उनकी पुत्री के मार्फत मुझे कुछ कविताओं का हिन्दी अनुवाद प्राप्त हुआ है, प्रस्तुत है।
 

1
ये मेड़
ये क्यारियां
मेरी नसें हैं
ओ गुरु ..
मेरी नसों में
ये पत्थर सनसनाने दो

2.
पत्थर पर उगी कँटीली झाड़ी से प्यार जताकर
हमने खेतों की रखवाली की है
सियारों की हुआँ हुआँ ने
हमारा हृदय झपट लिया है
उनको लगता है
वो जीत जाएंगे
पता नहीं
कहाँ से, कैसे
ये भीख की लूट
भवितव्य बनती है

3.
खेतों की मेड़ों पर
मैंने सांझ रंगी
मन की मेड़ों पर
मैंने रातें सजाईं
और तुमने
दूर रहकर
मेरी खिल्ली उड़ाई

4.

मेरी जड़ें हैं
यदि मुझे
सबका सब
कोई काटे
तब भी मुझे
डर नहीं लगता
जितने मेरे
टुकड़े होंगे
उतने गुना
मैं बढ़ता जाऊँगा

रमेश भगवंत वेलुस्कर
 


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