ख़लील जिब्रान

शिव प्रकाश गौड़ जी द्वारा अनूदिन ख़लील जिब्रान -ख़लील जिब्रान वे महानतम कवि, जिनके परिचय की जरूरत नहीं,
शिव प्रकाश जी, लागातार उनका अनुवाद कर रहे हैं, जो महत्वपूर्ण है।

फूल का परिचय-गीत


मैं लफ़्ज़ मेहरबाँ क़ुदरत के ख़ज़ाने से बरसा ज़मीं पर,
मैं चमकता सितारा फ़लक का उतारा ज़मीं पर ।
पंच पुर्ज़ों और ख़िज़ाँ के मेल से बना बीज मैं,
बसंत ने दी ताक़त ज़मीं फोड़ निकल पड़ा मैं ।
तेज़ धूप हो या वर्षा भारी तन कर खड़ा रहा मैं,
गर्मी और वर्षा में ही पला और बड़ा हुआ मैं ।
हल्की सर्दियों में रहूं खुश ख़िलाखिला मैं ,
भारी ठंड में क्यारियों में सोने चला जाऊं मैं ।
भोर-हवा संग मैं खिलता सूरज के स्वागत में,
शाम को विदाई गाता मैं बे-आवाज़ परिंदों के शोर में ।
मेरी ख़ुशबू हवा में चारों ओर इत्र घोलती तैरती,
मेरे रंगों की चूनर ओढ़ पहाड़-मैदान दुल्हन दिखती ।
जब मैं सोता, रात की आँखें रखवाली करतीं,
जब मैं जागता, सूरज की किरणें ताक़त दे सहलातीं ।
ओस की बूंदें बनी शराब, चिड़ियों का गीत मेरा संगीत,
तालबद्ध लहराती घासों संग मैं नाचूँ दिन हो या रात ।
मैं बनू आशिक़ का तोहफा, विवाह में वर-वधू की माला,
कोई विदाई हो या हो मौत, मैं सजाऊँ गुलदस्ता या माला ।
सूख कर भी महकाऊं बीते लम्हों की शीरीं यादगार ,
चाहे मौका हो खुशी या ग़म का मैं बनूं हिस्सेदार ।
मैं हमेशा देखूँ ऊपर केवल प्रकाश की ओर ,
और कभी ना देखूँ नीचे अपनी परछाईं की ओर ।
यही सोच-ए-नज़र चाहिये ,
आदमी होने और जीने के लिये ।

( ख़लील जिब्रान की मूल अंग्रेजी कविता Song Of The Flower उनकी पुस्तक A Tear and A Smile (1914) में संग्रहित है । उसी अंग्रेजी कविता का हिंदी कविता में ‘फूल का परिचय-गीत’ शीर्षक से भावरूपान्तरण करने का प्रयास किया है ।)
 

दो नवजात शिशु


हज़ार वर्षों पूर्व ,
एक राजा था सुंदर, आकर्षक और शक्तिशाली,
उसका राज्य था विस्तृत और विशाल ;
एक दिन था वह खड़ा राजसी परिधान में महल के छज्जे पर ;
नीचे खुले प्रांगण में थी खड़ी, शान्त प्रजा-जन की भींड़ अपार ;
राजा सम्बोधन में बोला, “ बधाई है शिशु राजकुमार के जन्म की,
तुम सभी को और इस भाग्यशाली राज्य को ;
वह बढ़ायेगा शाही परिवार का नाम ,
और तुम सब को होगा उस पर उचित गर्व-सम्मान ;
वह पूर्वजों की शूरता-प्रतिभा परंपरा का होगा उत्तराधिकारी ,
और उस पर निर्भर होगा हमारे राज्य का स्वर्णिम भविष्य ;
नाचो-गाओ और खुशी मनाओ, तुम सब सारे राज्य ।“
प्रजाजन की भींड़ ने,
प्रत्युत्तर में दिये आकाश-गुंजाते नारे और गीत ;
राजा और शासन के दीर्घ-जीवन की प्रार्थना थी नारों में ;
खुशी और कृतज्ञता की बारम्बार स्वीकृति थी गीतों में ;
परन्तु, उनकी प्रसन्न बोली और हाव-भाव में ,
नहीं था संपृक्त उनका विचार-संसार ।
वे सोच रहे थे क्यों ? और क्यों ?;
क्यों थे वे अभिशप्त जीने को निर्धनता में ,
क्यों थे वे भरते राजकोष-भंडार खून-पसीने से ,
क्यों थे वे दीनहीन-लाचार अत्याचारी शासन में ,
क्यों नहीं बनेगा वह शिशु-कुमार एक क्रूरतर तानाशाह ,
और क्यों नहीं करेगा वह
प्रबलतर प्रहार हमारे शरीर व आत्मा पर ;
एक ओर थी अंदर चल रही यह उधेड़बुन अपार ,
और दूसरी ओर था उनका प्रकट नृत्य-गीत-व्यवहार ।
उसी दिन राजधानी में ,
राजकुमार के जन्म के ही क्षणों में ,
जन्मा था एक अन्य शिशु सुकुमार अन्यत्र में ;
जब भींड़ कर रही थीं शक्तिमत्ता की स्तुति ,
न्यूनतम आंक रही थी अपनी सामर्थ्य-शक्ति,
और एक भावी क्रूरतर निरंकुश के स्वागत में थी नाच रही ;
और जब स्वर्ग-देवदूत थे व्यथित, रुंधेकंठ और क्षुब्ध,
देख बहुसंख्यक की अनुचित व दयनीय दासवृत्ति ;
एक कृशकाय और रुग्ण-सी औरत थी दुःखी विचारमग्न ।
उस औरत का,
अकेला खड़ा जीर्णशीर्ण छप्पर था उसका विपन्न-निवास ;
एक गंदी-मटमैली कथरी थी उसका आराम-बिस्तर ;
उसी बिस्तर में लेटी थी वह औरत
ढांप फटे-पुराने छिद्रयुक्त टुकड़ों से अपना शरीर,
और, उसके बगल में था चीथड़ों में लिपटा नवजात सुकुमार ;
और वह औरत कई दिनों की भूख से थी मर रही ;
पास रहा न था पैसा जो जुटाये कुछ खाना ।
वह औरत थी ,
एक विधवा युवती, अभिशप्त एकाकी जीने को :
उसका प्रेमी-संरक्षक पति राजा के उत्पीडन का हुआ शिकार ;
राज-कोप से सहमे सभी, उसकी सहायता न करे कोई ;
ईश्वर ने उसे दे पुत्र-उपहार, भेजा एक नया भागीदार ;
पर पुत्र-बंधन करने न दे उसे बाहर जीविकोपार्जन ,
और दोनो जीवन-संभावनाओं पर निकट दिखा एक विराम ।
राज-प्रांगण की छटी भींड़,
समाप्त हुआ कोलाहल और फैली स्तब्ध शांति ;
माँ की गोद में पुत्र पाये प्यार-अश्रुधार पवित्र-स्नान ;
भूख-शिथिल वाणी में माँ बोली प्यार से ,
“ क्यों छोड़ आत्मा-संसार, आया बांटने मेरा दुर्भाग्य ?
क्यों छोड़ देवलोक, चुना पृथ्वी-मानव-जीवन तुच्छ,
जहां प्रचुर थी -- व्यथा, उत्पीड़न और हृदयहीनता ?
तुम्हें देने को मेरे पास अश्रु के अतिरिक्त कुछ भी नहीं ;
क्या अश्रु करेंगे तुम्हें पुष्ट दुग्ध की भांति ?
तुम्हें पहनाने को मेरे पास रेशमी वस्त्र नहीं ;
क्या मेरी ठंडी-कांपती नंगी बाहें दे सकेंगीं तुम्हें गरमी ?
पशु-बच्चे दिनभर चर कर लौटते सुरक्षित आश्रय में ;
छोटी चिड़ियां दिनभर दाना चुग सोयें निश्चिन्त डालियों में ;
पर, तुम्हें कुछ नहीं मिल सके सिवाय प्रेम,
एक दीनहीन, अभाव-बर्बाद मां के आंचल में ।“
तब उसने गोद उठा बच्चे को लगाया सूखी छाती से ,
और भींज उसे कमजोर बाहों में पूरी मजबूती से ,
चाहे करना पूर्वभांति एक शरीर दो से ।
मां ने ,
अंगार दहकती आंखों से देखा आकाश ,
और चिल्लाई प्रार्थना में, “ हे ईश्वर !
मेरे अभागे देशवासियों पर दया कर ।“
सुन मां की करुण पुकार,
भागे बादल छोड़ चांद का डेरा ;
निखर चांदनी गिरी उस झोंपड़े में ,
दिखा रही थी दो लाशें उस में ।
और राजमहल से,
आरही थी राज-नर्तकी की तान ,
साथ था तबले-सितार का संगत-गान,
और उन सब से दिवंगत को देता दिखे
श्रद्धा-सुमन, निरंकुश राजतंत्र निर्लज्ज ।

( ख़लील जिब्रान की मूल कविता-कथा है ---- ‘Two Infants’ जो उनकी पुस्तक A Tear and A Smile (1914) संग्रहित है । उसी मूल कथा Two Infants का हिंदी कविता में भावरूपान्तरण किया गया है।)
शिव प्रकाश गौड़


मौन-प्रेम की मुखरता


एक थी अंधेरी रात,
सुनाई देती थी बस,
झींगुर की झंकार और एक कुत्ते की भौं-भौं ;
काले लबादे में खड़ी रात,
मुस्काते-छिपाते तैयार थी दिखाने,
कोई जादू या कोई रहस्य उस रात ।
आधी रात शयनकक्ष में,
बिस्तर पर लेटी युवा राशेल ने
आंखें खोल देखा छत-पार आकाश ;
उसकी सूनी आंखें
देर तक निहारती रहीं आकाश ।
तरह-तरह की आवाज़ें,
सुनाई दे रहीं थीं रॉशेल को ;
जीवन की चाहत से भी अधिक सुखद,
और किसी गहरे खोह से
आती कराह से भी अधिक भयावह,
और समुद्री लहरों के
संदेश से भी अधिक गहरी..…...।
और इन आवाज़ों में,
मिश्रित स्पन्दन था आशा और निस्सारता का,
मिश्रण था ख़ुशी और दुख का ;
और जहां था जीवन से लगाव,
वहीं थी मरने की दृढ़ इच्छा भी ।
रॉशेल ने
आंखें बंद कीं और
एक गहरी कराह भरी ;
विदा होती और
हांफती साँसों के बीच
वह थी धीरे बोल रही,
“घाटी के सुदूर किनारे,
भोर फैलती दिख रही ।
आओ चलें सूरज की ओर,
और उस से मिलें हम ।“
आवाज़ आना बंद हुआ
परन्तु बंद नहीं हुईं
गुलाबी होठों की पंखुड़ियां दो ;
वे दिखा रही हों जैसे
आत्मा पर गहरी चोट से बनी कोई दरार ;
और उसी फांक से
आत्मा पर गहरी चोट की पीड़ा,
अंदर ध्वनित-प्रतिध्वनित होकर
बाहर निकल रही हो जैसे ।
पहले से आमंत्रित पादरी ने
निकट आकर छुआ उसका हाथ
और उसे बर्फ जैसा ठंडा पाया ;
अब उसने अपनी उंगलियां
रखीं उसके दिल पर
जो गतिहीन था बीते युगों की भांति,
और पाया उसे मौन या शांत भी
जैसे स्व-हृदय में बसा प्यार ।
पादरी सिर झुकाए खड़ा हुआ मौन,
मिली ज़रुरी सूचना अन्य सभी को ;
पादरी ने मृत रॉशेल के हाथों को
क्रॉस करते रखा छाती पर,
और निकट खड़े पति से सांत्वना में कहा,
“प्रिय बंधु ! शांत रहें, धीरज रखें ,
आप की दिवंगत प्रिय पत्नी
चली गयी ऊपर दैवी आलोक परिक्षेत्र ;
आओ, दोनो झुक प्रार्थना करें उसकी शांति में ।“
प्रार्थना बाद फिर पादरी उससे बोला
“तुम्हें है आराम की आवश्यकता ;
जाओ उस कोने में दूर पड़े बिस्तर पर ।“
अब पादरी ,
कमरे के बीच था अकेला खड़ा मूर्तिवत ;
साक्षी था दो आत्माओं के अलगाव का ,
और अंदर चल रहे विचित्र द्वंद का भी ;
पहले आंसू-भरी आंखों से देखा रॉशेल,
और फिर देखा उसका पति
जो गहरी नींद में था बेहोश-सा ;
पति था सपनों की दुनियां में विचर रहा,
जैसे खेत-खेतान देखें सपना
उल्लसित बसंत का भीषण जाड़े बाद ,
और, रॉशेल शाश्वत शांति में दिखे अचल ।
पादरी सधे कदमों से बढ़ा,
रॉशेल के निकट घुटनों पर झुका,
जैसे पूजा-वेदी पर सिर झुकते श्रद्धा में ।
लगाया उसका सर्द हाथ
अपने कांपते होठों से और देखा चेहरा
ढंका मृत्यु के झीने पर्दे में ।
अब पादरी ,
और नहीं रोक सका अपने को ;
अंदर छिपा प्रेम और दुख दोनों
बह निकले बाहर रुदन में ;
संयत किन्तु गंभीर स्वर में रोते वह बोला,
“ओ रॉशेल, वधु मेरे आत्मा की,
ध्यान से मुझे तुम सुनो ;
मृत्यु ने है कर दी,
मेरी ज़ुबाँ आज़ाद आज रात ;
अब खोल सकूं वह राज़,
जो था जीवन से भी अधिक गहरा और गूढ़ ;
पृथ्वी और देवलोक के बीच,
तैरती-उड़ती ओ पवित्र आत्मा रॉशेल !
सुनो मेरी आत्मा की पुकार ;
याद करो वह युवक पेड़ों पीछे छुपा,
जो करता घण्टों इंतज़ार,
तुम्हें खेतों से लौटती देखने का ;
और, तुम्हारी सुंदरता की कौंध करे उसे मौन ।
सुनो पादरी को,
जो नियुक्त है ईश्वर की सेवा में,
पर हर लज्जा छोड़ आज पुकारे तुमको,
जब तुम पहुंच गई हो ईश्वर के घर ।
प्रमाणित है मेरा दृढ़ प्रेम,
जिसे दूसरों से वर्षों तक
अपने अंदर छिपा सका मैं। “
प्यार की आत्म-स्वीकृति बाद,
पादरी ने बड़े आहिस्ता-प्यार से
चूमा उसका माथा, आंखें और गर्दन,
जैसे सील-बंद करता हो अपना प्यार ।
प्यारे चेहरे के शीतल स्पर्श ने
तोड़ी तंद्रा और कल्पना सारी ;
घबरा पादरी पीछे हटा लड़खड़ाते ;
बैठ धम्म-से फर्श पर वह,
पतझड़ पत्तों जैसा कांपे थरथर ।
शीघ्र अपने को संभाला उसने,
और ईश्वर सम्मुख प्रार्थना में
घुटनों पर झुक आहिस्ता बोला,
“ हे ईश्वर ! तुम्हें था पता ,
सात-वर्षों पुराना मेरा गहरा प्यार ;
जब प्रेम नहीं कोई गुनाह-अपराध,
फिर मैं कैसे अपराधी ?
दुखद मृत्यु उत्पन्न आवेग ने,
बलात बाहर निकाला मेरा प्यार ;
हे ईश्वर ! सहायता करो मेरी,
बंद कर सकूं पुनः सुखद प्रेम-स्मृति को
हृदय की अतल गहराई में,
और छिपा सकूं उसे हर बाहरी से ;
माफ करना मेरे पाप व कमज़ोरियां,
आमीन, और आमीन............।“
अब निखर गया था सबेरा,
और चारों ओर था प्रकाश ;
सूरज ने सुनहले धागों से बुने
पर्दे से ढांक दी शयनकक्ष की मूर्तियां दो ;
एक दिखाती प्रेम और धर्म का द्वंद,
दूसरी दिखाये जीवन-मृत्यु की शांति अपार ।
प्रेम है एक उदात्त अनुभूति-आकांक्षा,
प्राप्ति-क्षणों में आदमी भूले ‘अहम अस्ति’ अहंकार,
और हो जाय देव-तुल्य या प्रकृति-संग एकाकार ।
( ख़लील जिब्रान की मूल कविता-कथा ‘ Behind The Garment ‘ , जो उनकी
पुस्तक ‘ Secrets of The Heart ‘ (1947) में संग्रहित है, का हिंदी में भावरूपान्तरण
‘ मौन प्रेम की मुखरता ‘ शीर्षक से किया गया है )


मरणासन्न व्यक्ति और गिद्धराज


हे उत्सुक मित्र !
हे प्रिय गिद्धराज !
ठहरो, ठहरो, अभी थोड़ा ठहरो,
शीघ्र सौंप दूंगा तुम्हें मैं, अपना मर रहा शरीर ।
शब्दो से परे मैँ हुआ बेबस-लाचार ,
फिर भी थका रहा मैं तुम्हारा धैर्य अपार ।
नहीं चाहता तुम्हारी भूख करे प्रतीक्षा और,
पर नहीं कटती मेरे सांसों की मजबूत डोर ।
मृत्यु भी कुछ ठिठके जीने की अंतिम आस से जैसे हार,
माफ करना, मेरी बातें यदि तुम्हें लगें बेकार ।
क्या कहूँ ? क्या करूँ ? समझ नहीं पाऊं मैं ,
याद करुं बहुत कुछ गुज़रा सुनहरा हरपल मैं ।
याद आते हैं वर्षों में बिखरे जलसे-जलूस के दिन,
युवामन के रंग-तरंग में डूबे सपनों के दिन ।
याद आये सलोना चेहरा जो पलकों का गिरना रोक दे ,
और वह हाथ जिसका स्पर्श तन में नई ऊर्जा भर दे ।
वह नजदीक होने की खुशबू अभी साँसों में महकती,
वह मधुर आवाज़ आज भी कानों में है खनकती ।
ओ गिद्धराज ! माफ करना, रुकना पड़ा प्रतीक्षा में ,
पर अब वह है समाप्त और शेष सभी गुम अंधेरे में ।
बीती यादों का सारा कुहासा हुआ दूर,
बचा है केवल भोज्य और पेय मेरा शरीर ।
बंधन खुल गये ,
डोर कट गयी ।
आगे बढ़ो , आगे बढ़ो, मेरे भूखे प्रिय साथी ,
परोसी है प्यार से जीवन की थाल तुम्हारे लिये साथी ।
आओ अपनी चोंच से करो कठोर प्रहार ,
तोड़ मेरा पिंजर करो मुझे आज़ाद इकबार ।
तुम्हारे साथ नापना है ऊंचाई, और ऊंचाई को,
उड़ना और चूमना है आकाश की गहराई को ।
आओ, अभी आओ, आ जाओ ,
करो न कोई देर, बस आ जाओ ।
तुम मेरे पूज्य प्रिय अतिथि आज रात,
और मैं तुम्हारा स्वागत-कर्ता आज रात ।


ख़लील जिब्रान की एक प्रसिद्ध कविता है---The Dying Man and The Vulture ,जो उनकी पुस्तक The Forerunner (1920) में संग्रहित है ; उसी अंग्रेजी कविता का हिंदी कविता में ‘मरणासन्न व्यक्ति और गिद्धराज’ शीर्षक से भावरूपान्तरण किया है ।


सलीब पर फांसी


एक दिन
मैंने की भींड़ से बात ;
मैंने जोर से चिल्लाते कहा ,
“हे, सज्जनो ! सुनो, ध्यान से सुनो मुझे ,
याद रखना, जल्दी दी जाएगी फांसी मुझे।“
भींड़ ने प्रश्न करते कहा,
“क्यों तुम्हारा खून हमारे सिर लगे ?”
मैंने जवाब में कहा,
“और कैसे तुम्हारा सिर गर्व से ऊंचा उठ सके
किसी उन्मादी-विद्रोही की फांसी छोड़ कर ?”
भींड़ के लोग सुन यह चुपचाप आगे चल पड़े ,
जैसे स्मृति में टांकने बाद उन्हें नहीं रहना था खड़े ;
बाद में, जब मुझे दी गई थी सलीब पर फांसी ,
उसमें मुझे मिली शांति-संतुष्टि ।

जब मुझे
सलीब पर लटकाया गया
पृथ्वी और स्वर्ग के बीच,
भींड़ ने अपने सिर ऊपर उठाये ,
मुझे देखने के लिये ;
उस क्षण वे सभी
अपनों में से किसी एक की फांसी से
गर्व-मिश्रित अनुभूति में थे ऊपर उठे ;
क्योंकि पहले कभी उनके सिर
नहीं उठ सके थे गर्व में ऊपर ।


वे थे
बड़ी संख्या में एकत्रित,
जहां मुझे फांसी थी हो रही सलीब पर ;
खड़े होकर वे थे देख रहे ऊपर मेरी ओर ;
एक व्यक्ति ने ज़ोर से पूछा,
“किस पाप या भूल का कर रहे प्रायश्चित?”
दूसरे ने चिल्लाते पूछा,
“क्यों कर रहे हो अपने जीवन का बलिदान?”
तीसरे ने गंभीरता से कहा,
“में सोचूं क्या तुम ऐसा मूल्य चुका
खरीदना चाहो संसार का मान-सम्मान?”
और चौथे ने कहा, “अरे देखो,
वह कैसा मुसकाते देख रहा हम सबको?
क्या कोई इतना दर्द कर सके है माफ?”

तब मेंने ,
उन सभी को उत्तर देते कहा,
“याद रखना केवल मेरी मुस्कान ,
मैं नहीं कर रहा कोई प्रायश्चित ,
नहीं कर रहा कोई बलिदान ,
नहीं इच्छा करूं कोई मान-सम्मान ,
और नहीं है पास कुछ जो हो क्षमा करना ;
मैं था परेशान भूख-प्यास से
दूसरे हजारों-लाखों की भांति ;
मैंने की मांग राजा से भूख-प्यास मिटाने की ;
मेरी मांग लौटती रही अनुत्तरित बदहवास
सत्ता के बंद कानों और गलियारों से टकरा बार-बार ।


यह स्थिति देख
निर्मम राजतंत्र से मैंने मांगा
अपना मांस और खून स्वयं के लिए ;
क्योंकि और कैसे, किस तरह बुझ सकी है
किसी उन्मादी की भूख-प्यास ,
उसका का मांस-रक्त छोड़ कर ?
मैं था मौन ताले-जड़े ज़ुबान से ;
मैंने मांगे पहरे के राज-सैनिकों से
खुले-मुंह के असंख्य घाव-छाले ,
जिनसे निकलता दिखे विरोध-स्वर हरपल ;
मैं था क़ैद तुम्हारे सिमटे-सहमे दिन-रातों में,
पर मैं रहा सदा निडर, उत्साहित और आशा-भरा ;
मैं था तलाश रहा इक दरवाज़ा
जो मुझे प्रवेश दे बृहत्तर दिन-रातों में,
और जो दे मुझे वह अनंत आकाश
जहां उड़ सकूं मैं स्वतंत्रता से शक्तिभर ।

अब मैं ,
विदा हो आगे जाता हूं
जहां जा चुके हैं वे दूसरे भी
जो पहले चढ़े थे फांसी मेरी तरह ;
भूल से भी मत समझना ,
उन्मादियों को डरा-थका फांसी के फंदे से ;
क्योंकि अधिक, और अधिक
और उससे भी अधिक बड़ी भीड़ के सामने
अवश्य चढ़ते रहेंगे फांसी मेरे जैसे उन्मादी ;
उन्मादी उल्लास के साथ जीयें और मरें ,
उच्चतर पृथ्वी और उच्चतर स्वर्ग के बीच ;
फांसी के पलों में भी रहें वे खुश सोचते,
सारे इंसानों को मिल सके है कल ,
प्रेम-भरा बेहतर जीवन और नई खुशियां अनेक ।


( ख़लील जिब्रान की अंग्रेजी काव्य-रचना है-- Crucified , जो उनकी पुस्तक The Madman (1918) में संग्रहित है। उसी अंग्रेजी कविता का हिंदी कविता में भावरूपान्तरण “ सलीब पर फांसी “ शीर्षक से किया गया है।)

 


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