रजत कृष्ण की कविताएँ

रिश्ते की धूप

(फुटपाथ पर छोटी बहन की कंघी करते बालक से बतियाते हुए)

रिश्ते की धूप यह
जीवन के पोर-पोर को
नहला रही है ऐसे
पवित्रता इससे अलग
कुछ और होती ही नहीं जैसे।

अपने हिस्से का
सब कुछ समर्पित तुझे यों
जीवन का अपना ताग हरेक
तेरे लिए ही तो मैंने बुना है ज्यों।

तुझे देख-हाँ, तुझे ही देख
दुनिया मैं अपनी पूरी देख लेता हूँ बहना।
उदास जरा भी न होना तू कभी,
मैं तेरी नींद में मुंदी पलक-सा हूँ
तो जागरण में
कंकर-पाथर की चुभन स्वयं पर धारे
तेरे पाँव तले ही पनही हूँ।


तेरी खातिर ही तो
मुझे जीवन यह पूरा का पूरा जीना है।
तू मेरी बहन, भाई मैं तेरा
जानने वालों का फकत इतना ही कहना है।
पर बात सच्ची मेरी गुड़िया
एक कहूँ- कि मैं तुझमें
कभी माँ के अंतिम दिनों का
अक्स देखता, तो कभी
पिता के टूटे-बिखरे जीवन में
सदा सहेजे-धरे गए
सबसे सुंदर सपने
सबसे अनमोल धरोहर देखता हूँ।।
 

(रजत कृष्ण  की अन्य कविताएं)


सिमन्तिनी रमेश वेलुस्कर की कविताएँ
 

पर्यावरण दिवस पर
झाँकियाँ निकलती हैं
तस्वीरों की
प्रिंट और सोशल मीडिया में
पौधरोपण करते हुए लोगों की

तस्वीर एक समय की यात्रा है
एक औरत पेड़ से चिपकी
समय की आरी ने कितनी औरतें काटीं
देह से विदेह किया जाना भी बलात्कार ही है

सुदूर पूर्व से एक चीख़ सुनाई देती है
समय थरथरा रहा है नग्न खड़ी औरतों को देख
उनके हाथ में खोखली परम्परा को तोड़ती तस्वीर है
सभ्यता को असभ्य बताते शब्दों की

उस नग्न औरत की भाषा सुखी है
क्योंकि उसमें अनाथ बलात्कार और विधवा शब्द नहीं हैं

हज़ारों किलोमीटर में फैला जंगल
प्रतीक्षारत है
किसी अमृता विश्नोई के आने की
लाखों पेड़ नहीं जानते हैं
कि सुदूर पूर्व की उस भाषा में अनाथ शब्द नहीं है
जंगल नहीं जानते कि वे अनाथ हो रहे हैं

चीनी लोककथा का राक्षस तेल पीना चाहता है
जंगल के गर्भ में दबा हुआ

मेरी उंगलियों से साल का चिपचिपा द्रव्य रिसता है
और गाल पर फूटता है एक नमक का बुलबुला

दुनियाँ में जो भी प्रेम है उसे बचा लिया जाना चाहिए


(सिमन्तिनी रमेश वेलुस्कर की अन्य कविताएं)


अक्षिणी  की कविता


आदमी ही तो है..

आदमी ही तो है..
मिलता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर ,
गिनता उसी को है जो मिलता नहीं..

आदमी ही तो है..
चाहता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
मिलता है जो यूँ ही उसे साधता नहीं..

आदमी ही तो है..
खोजता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
ढूँढता उसी को है जो जानता नहीं..

आदमी ही तो है..
जानता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
जानता जिसे है उसे पहचानता नहीं..

आदमी ही तो है..
सुनता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
करता मन की ही है जिसे गुनता नहीं..

आदमी ही तो है..
मानता तो बहुत है ज़िंदगी में मगर
ठानता उसी की है जो मानता नहीं..



(अक्षिणी  की अन्य कविताएं) 


Triin Soomets  की कविता ( Estonia)

कोलकाता

सड़कों की धूल
मेरे नाखूनों में

सड़कों की धूल
मेरी पलकों के नीचे

सड़कों की धूल
मेरी जीभ के नीचे

सड़कों की धूल
मेरी त्वचा के भीतर

गलियों में चमकती धूल
ही एक मात्र बहूमूल्य चीज है
जो केवलकही जा सकती है
सिर्फ मेरी

अनूदित‍ रति सक्सेना

Translated by Rati Saxena

(Triin Soomets की अन्य कविताएं)


सुकृता पाल कुमार  की कविता


चूड़ियाँ पहनने की कला

खाली पन्ना पहनता है शब्द
उसी शौक और सब्र से
जैसे लड़कियाँ
पहनती हैं काँच की चूड़ियाँ
एक-एक कर, ध्यान से, धीरे-धीरे

एकदम सही माप की
न चटकें, न खुरचें
दबती कलाइयाँ
गुज़रती हैं जो उन गोलाइयों से
बहुत ढ़ीली, लटकती हुई न हों
न इतनी तंग कि टकरा जाएँ त्वचा से

झंकृत होने दो उन्हें
उल्लास में छलकने दो, गति में थिरकने दो
नृत्य में लय हो जाने दो
जैसे कविता होती है लय पन्ने में |
 

(सुकृता पाल कुमार  की अन्य कविताएं)
 


शिवांगी शंकर  की कविता

बंदिश

जैसे असीम को क़ैद करना चाहते हों-
भाव को स्वर, स्वर को अर्थ
अर्थ को शब्द और शब्द लयबद्ध
विस्तार को दायरा देते हैं
और कभी सोचते हैं
क्या नकार रहे हैं इस विस्तार को?
जैसे असीम को क़ैद करना चाहते हों।

अपनी सीमित समझ से
शब्द लयबद्ध, उनसे अर्थ,
अर्थ से स्वर, स्वर से भाव
का रस लेते हैं-
दायरे को विस्तार देते हैं
कि क़ैद को असीम का कुछ आभास हो जाए।


(शिवांगी शंकर  की अन्य कविताएं
)



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