रजत कृष्ण की कविताएँ


ताले जड़ दो स्कूलों में

उतार फेंको बस्ते भारी
बच्चों की पीठ से
कि उनकी पीठें दुखती हैं।

ताले जड़ दो
उन स्कूलों में
जहाँ बच्चों का दम घुटता है।
खदेड़ दो
उन सभी ‘टीचरों’ को
बच्चों की नींद से
जो ‘लेजी’, ‘डल’
और ‘पुअर’ का ठप्पा ठोकते हैं।

मुक्त कर दो
मुक्त-बच्चों के आसमान को
कि माँ-बाप की
उम्मीदों की पतंग को
दिशा देते-देते
उनकी साँसांे के कच्चे ताग टूटते हैं।

पिकनिक पर कालेज की लड़कियाँ

पिकनिक मनाने आई
कालेज की लड़कियाँ
रह-रहकर खिलखिल हँसती हैं
और आपस में एक-दूसरे को
छेड़ती-गुदगुदाती ऐसे
उनका अपना आँगन हो
यह पूरी की पूरी धरती हो जैसे।

बांध पर बोटिंग करती
उमंगित है सब इतनी
कि उनकी साँसों तक
चढ़ती-उतरती हैं जल तरंगे
और उनकी आँखों के जल में
तैर उठती हैं मछलियाँ
जैसे कि समुद्र हो वह।

पिकनिक मनाने आई लड़कियाँ
मुट्ठी में बांधे हवा को
हिलोर रही हैं ऐसे
हुलसते आसमान पर
ढील पाती पतंगे हों जैसे।

पूर्वी छŸाीसगढ़ के
सबसे आखिरी जनपद बागबाहरा से
पिकनिक मनाने आई लड़कियाँ
जब लौट रही हैं घर अपने
गंगरेल से-
लग रहा कि अपनी वेणियों में
गूंथ ली हों सबने
चांदनी शरद पूर्णिमा की
और सहेज लिया हो
मुट्ठियों में
सोलह कलाओं वाला चांद भी।

पिकनिक मनाकर लौटती
लड़कियों की आँखों में झाँके जरा
वहाँ जैसे किलक-पुलक रही है
धानी धरती
और झुक आया हो जैसे
पाँवों पर
पूरा का पूरा सिंदूरी क्षितिज ही।।



धुन वह

मौज भरे दिनों में
भुला दिए ये मुखडे़
जिन दर्द भरे गीतों के
उनकी धुन याद आई
आज फिर से।

चकाचैंध भरी बिजलियों से
त्रस्त है आज
मेरे हिस्से का
कतरा-कतरा अंधेरा
और याद आ रहा
तुलसी चैरा में
बिला नागा, रोज
माँ के हाथों बारा जाने वाला दीया।

क्या करूँ, कहाँ जाऊँ
कि मुक्ता सकूँ मैं
मिडिल स्कूल की
उस साथिन का मुखड़ा।
जो सोलह साल बाद
आज मुझे फेसबुक पर
सैकड़ों लाइक और कमेंट्स के बीच भी
अकेलेपन और उदासी की झाँई में
कहीं बुझा-बुझा सा
कहीं टूटा-टूटा
बिखरा-बिखरा सा मिला।

आई याद फिर से आज
धुन वह
मौज भरे दिनों में
भुला दिए थे जिनका मुखड़ा और अंतरा।।


 


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