सिमन्तिनी रमेश वेलुस्कर

 
बया

काश मैं बया होती
कि जुगनू टांक कर अपने घरोंदे में
अँधेरे को डरा देती
काश मैं बया होती
मगर हूँ एक बेटी ...
जिसे तुम ले के आये समंदर से जहाँ में
बनाया झोंझ भी मेरे लिए इक
टांक कर ढेर जुगनू
मैं हूँ अल्हड बया सी
कि फिर से घास के तिनकों के सर पर
पहन कर ताज शबनम का
मैं अब चुनती हूँ कांटे
पहन कर उँगलियों में अपनी
एहसासों के दस्ताने
मैं अब सिलती हूँ खुशबू
वक़्त की सुतली में बट कर
खटोले बुन रही हूँ छोटे छोटे
तुम्हारे बैठने को धूप के मौसम में
जाड़े में
दुशाले बुन रही हूँ अपने शब्दों के
तुम्हारी ही कलम से ले के स्याही
उजाले भी पिरोने हैं मुझे अब
ये दुनिया भी बया के झोंझ सी है
टंके हैं सैकड़ों जुगनू भी इसमें
है फैला फिर भी नफरत का अन्धेरा
मगर मैं बुन रही हूँ झोंझ फिर इंसानियत का
जो तुमने चोंच से मेरे परों पर है संवारी ...
मुझे लगता है अब ये
कि मैं हूँ इक बया सी


भविष्य का बच्चा

जब तुम बूढ़े हो चुकोगे
और तुम्हारी अगली पीढ़ी जवान
तब वो भविष्य की सुनहरी किरण
जो तुम्हारी चुप्पी की कालिख में धुंधली हुई है
तुमसे पूछेगी
जब समय इतना क्रूर था
तब तुमने क्यों नहीं फूँका
बग़ावत का बिगुल ?

भविष्य का बच्चा
पूछेगा एक बूढ़े बुद्धिजीवी से
क्यों नहीं दिखाई
नए रास्ते पर रोशनी

भविष्य का बच्चा
पूछेगा सवाल अपने माता पिता से
क्यों नहीं पूछ पाये सवाल
जब तुम दरकिनार बच्चे थे

भविष्य का बच्चा
पूछेगा सवाल अपने समाज से
किस नींद में थे कि
सोकर ही बर्बाद कर दिया
हमारा आज
जो उस वक़्त तुम्हारा ही भविष्य था ?

भविष्य का बच्चा
पूछेगा सवाल बूढ़े हो चुके कवि से
तुम्हारी कलम की सियाही
आग क्यों नहीं बनी तब
जब हमारे आज को तबाह करने के लिए तुम्हारे सियासतदां
पुरज़ोर कोशिश में लगे थे

भविष्य का बच्चा पूछेगा
सवाल अपनी पुरानी नस्लों से
समय बेशक़ अंधेरा रहा होगा
अंधेरा आँखों को ग़ुलाम कर सकता है
पर आवाज़ को नहीं

और तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं होगा
क्योंकि तुम आज सो रहे हो
भविष्य से आती हुई उस चीख़ से अनजान
जो तुम्हारी ही आने वाली पीढ़ी की है.
क्योंकि भविष्य का बच्चा
ग़ुलामी से दोस्ती नहीं करेगा


लीबिया के समंदर की डायरी के कुछ अंश


लकीरों से अलग हुए तुम्हारे देश को
पहली बार देखा
कचरे के साथ मेरे किनारे फेंके गए एक फटे हुए नक़्शे में
तुम्हारे देश की मिट्टी भी
मेरे देश की मिट्टी जैसी होती है
उसे भी पहली बार छू
कर यही लगा
कि माँ की गोद में हूँ

यार...
तुम्हारे देश का आकाश भी
बिल्कुल मेरे देश के आकाश के जैसा है
यहाँ भी परिंदे
अपनी मर्ज़ी से उड़ते हैं

अरे .....
तुम्हारे देश के परिंदे
मेरे देश में भी आते हैं
बिना वीज़ा के
बिना पासपोर्ट के
बिना डरे .....

मगर तुम नहीं आ पाते
अच्छा हाँ .....
तुम्हारा देश मेरे देश से अलग है ना
मेरे देश में समंदर नीला है
तुम्हारे देश में लाल
शायद तुम्हारी गुस्से से लाल हो चुकी आाँखों का रिफ्लेक्शन है
इसीलिए तुम्हें वो ख़ून
पानी सा दिखा होगा
जो तुमने लीबिया के समंदर में बहा दिया
मगर याद रखना .....
समंदर अपने पास कुछ नहीं रखता
तुम्हारा डर और कायरता इसी ख़ून के साथ
तुम्हे वापस कर देगा


मथुरा के रास्ते से घर लौटते हुए
एक बार
बीन लाई थी कदम्ब की गेंदों में तुमको
और तोड़ लाई थी कुछ घुँघरू
तुम्हारी रासलीला के
तुम्हारे माथे के मोरपंख को
कानों के कुंडल बना पहना था मैंने
तुम्हारी बांसुरी अधरों पर लगा
और नाचती रही उन घुंघरुओं को पहन
तुम्हारी त्रिभंगी छवि बना
गूंजते रहे कवित्त के बोल
नीर भरत यमुना तट पर
भर भर नीर उठावत गागर
मोहे छोड़ छोड़ माधो माधो माधो
तभी तो मेरा नृत्य
खींच लाया तुम्हे मेरे आँगन तक
और तुम छोड़ आये थे वृंदावन
उस निविड़ निशा में
और तुम्हारी चमकती हुई कृष्ण आभा में
कस्तूरी ढूंढते हुए नीलाभ मृग से
मैं ही तो थी तुम्हारी कस्तूरी
तुम्हीं में समेकित
तुम्हारी नाभि में स्थित
अंतर सुगन्धित
तुम हर जगह ढूंढते हो
मेरा मन
मन कस्तूरी सा
ढूढ़ रहा था मृग नाभि
तुम्हे पाया
वेदना छलक कर प्रेम हो गई

 

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