अक्षिणी  की कविताएँ

 
क्षितिज कहाँ..

क्षितिज कहाँ,देखा किसने
कौन वहाँ तक चलना है..
मरीचिका एक क्षितिज सी,
धरती अम्बर का मिलना है..
सूरज का ढलना भी केवल
मन की अपनी छलना है..
ओझल हो इन आँखों से,
और किसी ठोर निकलना है..
मत रोको रजनी को,
उसको भी अपनी कलना है..
नियति चक्र न थमता थामे,
व्यर्थ मनुज के काँधे छिलना है..


कल कोई..

कल कोई मुझसे मिला
राह के चाह में भटका हुआ
चाह की आह में अटका हुआ

कल कोई मुझसे मिला..
घाट के घुमाव में उलझा हुआ
धार के प्रवाह में दुबका हुआ

कल कोई मुझसे मिला..
राख के ढेर सा बुझता हुआ
आँच के फेर सा सुलगा हुआ

हाँ कल कोई मुझसा मिला..
काल के प्रहार से हारा हुआ
आस के विश्वास का मारा हुआ

हाँ कल कोई मुझसा मिला..

इक हाथ बढ़ा कर टोह लिया
बस मान बढ़ा कर मोह लिया..


अपराधी..

न राज का भय
ना समाज का भय
ना आत्मा-परमात्मा का भय
न भूत का भय
न भविष्य का भय
न कर्म का न धर्म का भय
आज,आज में लीन
भयहीन पथभ्रष्ट
निर्लज्ज स्वलीन
आत्ममुग्ध
आत्मघाती
मनुष्य
अपराधी तो है ही..

मरुस्थल की बेटियाँ

मरुस्थल की बेटियाँ
खेजड़ी सी होती हैं
सीधी सादी बेपरवाह
सब से बेखबर
डटी रहती हैं बारहों मास
निरपेक्ष सहती हैं ताप
और आँधी तुफान
खड़ी रहती हैं सर उठाए
अपनी अस्मिता लिए
कैक्टस के काँटों के बीच
जीवन रेत के अँगारों में
संघर्ष के स्वरों में लीन..
 

मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ