Triin Soomets

 
तुम अपमान के उपग्रह पर जगे
और आस पास देखा
हर पल, हर सांस दी जा रही है
फिर ली जा रही है।
तुम अपमान के द्
दिया, फिर लिया गया।
तुम अपमान के उपग्रह पर जगे
और वापस लौटना चाहते हैं
लेकिन नहीं
काल की सेवा अन्त तक की जानी चाहिये
पूरी तरह से मापना जरूरी है
मापा हुआ।
तुमने अपनी इच्छा व्यक्त करना सीखा,
चलना, बात करना भी,
बात छिपामा भी, गुप्त रूप से,
इच्छा पूरी करना भी।
तहखाने में पुश अप करते हुए
काल ने दिया, लेकिन फिर
फिर चीथड़े की वापिस ले लिया

=
तुम्हारे लिये मुझ खोज पाना सहज है
बस शहरों के सबसे अधिक आबादी वाले वर्गों को खोजें
या फिर वहां जहां महंगे काफी हाउस या होटल हों
धूल झाड़ियों के नीचे
कहीं न कहीं
सुनसान डेल्टास, उत्तरी टुंड्रा, मैक्सिकन लगुन भूलभुलैय्या को देखें
मैंने आपके लिए हस्ताक्षर छोड़ दिए हैं
अपनी आंतरिक नदी के तट पर प्रतीक्षा कर रही हूं
यदि तुम वसंत से आरंभ करते
तो मुझे खोज पाना आसान होता

+
जीवित रहना है
तो तुम्हे आगे आना पड़ेगा
अपने से भी आगे

या फिर अपनी जली
पुतलियों से
धूल झड़ रही होगी

तुम्हे आगे आना होगा
अपने स्वत्व से भी
अपने देश को पार करते हुए
अपने घर को कहीं और खोजते हुए
नहीं तो तुम नहीं पहुंच पाओगी

*
पेड़ के तने से बरसात की
धरती की ओंर राह
पेड़ के तने से बिजली की
धरती की ओर राह
हवा से पंछी की
धरती की ओर राह
जल पर से नाव की
धरती की ओर राह
समन्दर से खैवेया की राह
धरती की ओर राह
और धरती की राह
तुम पर

*
आपका कितना भार है
कुछ ज्यादा नहीं
कोई भार होता ही नहीं
गर्दन पर कोई पत्थर नहीं बंधा है
जेब में मुट्ठियां नहीं

खून में लोह नहीं
साइनस में कोई पीप नहीं

को कोई भार नहीं जो
नाखूनों को बाहर निकाल सकें

जिससे सब कुछ चिकना बन जाये

*
इसे ना खाया जा सकता
ना ही उलटा जा सकता है
इनके साथ मैं
किस तरह रह सकती हूं
चलों छोड़ो,

आनन्द महसूस करो

 

Born in Tallinn in 1969, Triin Soomets is the author of 20 books, most recently Armukesed (The Lovers, 2018). She is a member of Estonian Writer´s Union since 1999. Her work has been widely anthologized and translated into more than twenty languages. She received the annual prize of literary magazin Looming 2018, Estonian Cultural Endowment Award in 2014 and has won or been nominated for many other awards and honors. In her poems a human being is the arena for eternal opposition of antagonistic forces – desire for pleasure and destruction, dominating and succumbing to raw force, but maybe even culture and nature.

 


 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ