सुकृता पाल कुमार

गुरु

योगी हैं पेड़
तन कर खड़े अपनी जड़ों पर
दिव्य निस्संगता की
प्रभा बिखेरते

हर एक
अनूठा
और संतुष्ट

धीरे से बहती हवाओं के मौन संगीत में
गर्व से झूमते
विचारशून्य स्थिति में ध्यान मग्न
अपने अस्तित्व की एक-एक पत्ती में
पवित्र साँसें फूँकते


भरी दोपहर में
ठंडी छाया देते हैं,
शांत, विश्राम कर सके धरा


अपनी महिमा से निर्लिप्त
योगी वृक्ष

मैदानों की कठोर ऊष्णता
कैसे समझ सकेगी
उनकी आनंदमय ताज़गी को

ऊपर की ओर उठता पेड़
किसी उद्देश्यहीन खोज में
उसकी ऊँचाई रखती है सुरक्षित
मिट्टी में उसे
दूर दमकते सूरज की प्रफुल्लता
मद्धिम पड़ जाती इस योगी
की आभा में

एक मेरे आँगन में भी है

मैं साँस लेती हूँ,
उसके दर्शन, ऊर्जा और रोशनी में
जिससे
अपनी जड़ों, शाखाओं और पत्तियों को
सींच सकूँ
 

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