शिवांगी शंकर   की कविताएं
 


स्पष्टीकरण

शर्म नहीं, डर है ये
आँखें नीची, मुट्ठी बंद
नज़रें उठाई भी तो पल भर को
कहीं कोई उनमें देख ताप न ले|

आँसू अब ग़म से नहीं
क्रोध उनका स्रोत है
नम हुईं भी तो एकांत में
कहीं कोई कमज़ोरी को माप न ले|

पर ये दीवार, दीवार ही है
और ये द्वार, बंद ही हैं
खुले भी तो चयन करके
इसको कहीं समझ न्यौता आप न लें|


रूपांतरण

जब माँ उसे कर देगी त्याग
जात धर्म हो जाए अभाग,
जो अकुलाए उस कर्ण को
उसके सीने स्वर्ण को
न मिले आदर न वास,
कर्ण किससे रखे आस?
सूत पुत्र होने पर जो
वो हास्य, घृणा का पात्र हो
तो दुर्योधन आएँगे
कर्ण कौरव होते जाएंगे।
कर्ण कौरव होते जाएंगे।


सफ़ाई


कितना शोर है चारों ओर
कितना शोर और कितनी गंदगी!
नहीं, फ़िलहाल हमारे इत्र की बोतल खतम हो गई है।
समझते हैं हम- आप सोच रहे होंगे,
इतना विष उगलती ही क्यों हो?
इतना विष उगलती क्यों हो?
कूड़ा बढ़ता जा रहा है
दुर्गंध से घुटन सी हो रही है।
समझते हैं हम- अब हमने सफाई छोड़ दी है
अब हम आपका कचड़ा साफ़ नहीं करते
और हमने विष पीना भी छोड़ दिया है
तो गंदगी तो है।
बास हमें भी आ रही है।
लेकिन क्या है कि हम अभ्यस्त हैं
इस दुर्गंध के बावजूद
अब जब विष पीने की जगह उगल रहे हैं
तो राहत मिल रही है।
लेकिन... बास तो आ रही है।

अब वाद नहीं केवल विवाद होता है
माहौल ही कुछ विषमयी है।
चलिए, ना मेरी न आपकी।
इस बार सफ़ाई आप शुरू कीजिए
हम इत्र की बोतल लाते हैं।
मामले को शांति से सुलझाते हैं।
क्षमा कीजियेगा, अब विष पीने का अभ्यास छूट गया है
शायद हम कुछ ज़्यादा बोल जाते हैं।
 


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