लोकनाथ यशवन्त की कविताएँ

लोकनाथ यशवन्त का जन्म 13 मार्च 1956 में हुआ, आपने प्रि यूनिव्हर्सिटी तक शिक्षा प्राप्त की। आपके कविता संग्रह हैं - आता होउन जाउन द्या!, आणि शेवटी काय झाले? आदि हैँ।
लोकनाथ यशवन्त की कविताएँ मराठी दलित साहित्य की मौलिक रचना है, यह दुनिया के हर शोषित आदमी की पीड़ा है, इसलिए वह अधिकारों से, सुविधाओं से वंचित हर तबके के लोगों की बात हो जाती है। यकीनन उनकी कविता भूत वर्तमान तथा भविष्य की ओर देखने का नजरिया है। दलित साहित्य ने प्रान्त की, भाषा की, देश की हर सीमा लाँघकर विश्वभर में पहुँचने के लिए अपने आपको तैयार किया है। लोकनाथ की कविता दिल और दीमाग दोनों पर वार करती है। इन कविताओं का अनुवाद किरण मेश्राम ने किया है जो पेशे से तो ठेकेदार है, किन्तु साहित्य अभिरुचि होने के कारण अनुवाद व लेखन से जुड़े हैं। मिट्टी से जुड़े लेखन में विशेष रुचि रखते हैं, इन कविताओं के अनुवाद में किरण मेवाश्र अनुवादक से ऊपर उठकर साहित्यिक संवेदनाओं ‌और सामाजिक सरोकार रखने वाले साहित्य प्रेमी के रूप में उभर कर आए हैं।
लोकनाथ यशवन्त का पता हैः‍ सत्यमं , विश्वकर्मा नगर , नागपुर 44027,महाराष्ट्र।
किरण मेश्राम का पता है - 12 सिद्धार्थ भवन, दूसरी माला, कास्मोपोलीटन हाऊसिंग सोसाइटी, सोमलवाडा, वर्धा रोड, नागपुर‍ - 440025

एक ‌और ठहराव

कोई मजदूर इश्ताहार के लिए जब भी कील ठोकता है
मुझे सलीब पर चढ़ा ईसा याद आता है।

इस शहर की तहजीब के बारे में न पूछो
उजालों की दूकानों में अँधेरा है यहाँ। ।

अपने पाँव अपने हाथों में लिए चलते हैं
यह वो शहर,जहाँ लोग लाशे बनकर जीते हैं।

बादलों सा सारे शहर को धुँए ने घेर लिया
कारखानों के आँगन में फिर भी हरियाली है।

मेरी बेबसी समझों , मैं कोई मदद नहीं कर सकता
उठाकर कोई मुझे आई डी सी के गेट पर रख दो।

चिल्ला चिल्ला कर कहता रहा किसी ने सुना नहीं
गला क्या बैठा, लोग सुनने आ गए।

लीडर

लीडर बनकर एक मोर्चा हम ले गए
हमेशा की तरह हम आगे,मोर्चा पीछे।

अचानक मोर्चा बिखरा,पुलिस भी बन्दूल ताने
हम संभले, अब मोर्चा आगे हम पीछे।

मौका देखकर वहाँ से हम भागे
ये देख रास्ते के एक चक्के ने हमें गांडू कहा।

मेरे लोग

तुमने कहा समन्दर हमारा,तुम लहरें संभालो
मैंने कहा आदमी हमारे, हम मोर्चा संभालेंगे।

जिनकी आँखों की रोशनी कम हुई
उन्हे रोशन आईना दिखाना है।

आपस में ही लड़ रहे, जो कसाई की ओर जा रहे
बकरों को अपने हलाल होने का अन्दाजा नहीं?

पानी कैसे कैसे रंग बदलता है
ये कैसी परदादारी है तुम्हारे समन्दर की?

मोर्चा तो खामोश था, लाठी हमला हुआ कैसे?
हमारे लोग गंभीरतासे सोच रहे हैं।

क्रान्ति

सूरज अंधा होकर बेबस नजर आए अंधेरे में
हजारों लंगड़े घोड़े तेज भागे टूटे रथ को लेकर।
पागलखाने से पगले निकले विश्वविद्यालयों के रास्तों पर
चिल्ला चिल्ला कर बेजुबान भाषण दें चौक-चौक में।
और मै भी सोचूँ जिहाद का अपने खाली दिमाग में
माँ की सूखी छाती को अपने दुधिया दाँतो से
खींचते वक्त दर्द से उसकी आँखों से गिरे
दो आँसू लेकर मैं भी बेतहाशा भागूँ संसद की ओर
कोढ़ी मोर के खूबसूरत पंख जल जाएँ नाचते- नाचते
और भिखारी डकार ले पेट भरने की।

ढिंढोरा

हर बार वो झोपड़ियाँ तोड़ते गए
हर बार हम बनाते गए

मिटाना उनका शौक
तामीर अपना काम

एक बार ही हमने महलों को तोड़ फेंका
तो इतना ढिंढोरा क्यों?

बुनियाद

अब तक जो हुआ,बहुत हुआ
इस के बाद हम से संभल कर ही रहो

तुम्हारे मकान की बुनियाद हमारी है
वो हमारा कहा मानती है

वक्त को पहचानों,वह एक-सा नहीं रहता
संभलकर रहों वरना कुछ भी हो सकता है

तुम्हारे मकानों की बुनियाद हमारी है
हम कभी भी हिला सकते हैं।

पलायन

जाते-जाते एक बार मुड़कर देखा होता
बस्ती जल रही थी, हम खामोश थे।

अज कल में इसे बदलना ही था
बगावत की आवाज गाँव में उठनी ही थी।

पंछी घोंसले के साथ बच्चे बच्चे तक छोड़ देते हैं
कोई साँप जब उन पेड़ों पर चढ़ जाता है।

आदमी ने ऐसा कभी करना नहीं
बस्ती जलने लगे तो भागना नहीं।

आवेग....

मेरी आवाज में लाखों लोगों की चीखें हैं
मेरे चलने में करोड़ो पाँव की रफ्तार है।

ताकत आजमाईश के लिए जंग शुरू होती है
झुकी नजरें उठाकर,तुम एक उंगली बता दो।

मुझमें जिन्दा है,अब भी अपनी संवेदनाएँ
मिल जाती है मुझमें पाक बच्चों की कशिश।

खामोश हूँ फिर भी जागा हुआ हूँ मैं
अब करवट लेने की सोच रहा हूँ मेँ।

 

 

मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ