मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

शाम को जब सारी चिड़ियाँ किसी एक दरख्त पर बैठ जोंर जोर से गला फाड़ टिटयाती हैं, तो लगता है कि ना जाने कितने मंजीरे एक साथ बज रहे हों, और भी न जाने कितने नजारे जो मैं भूल चुकी थी, या जानती ही नहीं थी। तभी मुझे महसूस हुआ कि ये सब नजारे उतने ही सच हैं, जितनी सड़क पर एक दुर्घटना, या फिर ऐसी ही कोई कड़वाहट, लेकिन चिड़िया, फूल, बादल पर कविता न करना मेरी बाध्यता बन गई है। क्यों कि यदि मैंने इन सब पर लिखा तो मुझे कवियों की जमात से देश निकाला मिलने में वक्त नहीं लगेगा, मुझे परम्परावादी या ना जाने कितने आभूषण मिल सकते हैं। मुझे याद है कि एक नामी कवि, सम्पादक ने मुझ से कहा था कि आपकी कविता का विषय मछुआरिने, या ऐसे ही गरीब तबके की स्त्रियाँ और उनके दुख- दर्द होने चाहिए,मध्यमवर्गी औरते नहीं। तब मैंने उन्हे जवाब दिया था कि, मैं मछुआरिनों को सलाम करती हू , क्यों कि जैसी निर्भीकता हम मध्यमवर्गी औरतों में कहाँ,

रति सक्सेना
और »

 

 

समुद्र तट पर जंजीर से जकड़ा हुआ
प्राचीन घोड़ा
एक तंग तबेले में
खड़ा भी न रह सकने वाला
उसकी लम्बी मजबूत गरदन
उसकी भव्य कसावट ‌और भरपूर अयाल
उसका तेज-तर्रार शरीर
और घुप्प काला लिंग
पर उदास आँखे
मेरी ही राह देखते
मेरे आते ही मेरे गाल पर,गरदन पर
उसका रगड़ा हुआ मुँह
वह जाना पहचाना पाशविक दर्प
यह समुद्र की नमकीन गंध

दिलीप चित्रे
*
सबसे बीच उपस्थित
दृश्य से बाहर
सबसे खतरनाक
मुजरिम है वह
इस सदी का

समूचे देश को
अपने आरामगाह मे तब्दील करता
हमारे बुजुर्गवारों की
शख्सियत से जोंक की तरह
चिपका है वह

लीलाधर मंडलोई
*
किस्सा यों हुआ
कि खाते समय चप्पल पर भात के कुछ कण
गिर गए थे
जो जल्दबाजी में दिखे नहीं।
फिर तो काफी देर
तलुओं पर उस चिपचिपाहट की ही भेंट
चढ़ी रहीं
तमाम महान चिन्ताएँ।

वीरेन डंगवाल
और »

 
स्थापित साहित्य में जिस शब्दावली का प्रयोग दिखायी देता है, वह देखने में तो आकर्षक लगता है, भाषा चमत्कारिक होती है, लेकिन साथ ही तर्कजाल में उलझा देने वाली भी, जो यथास्थिति ‌और आत्मसन्तुष्टि को ही स्थापित करती है, ऐसे लोग स्वयं कुछ सीखना नहीं चाहते, लेकिन दूसरों को सिखाने को तत्पर रहते हैं , सामाजिक संघर्ष की वस्तुगत परिस्थितियों के अध्ययन में ऐसे लोगों की कोई रुचि नहीं होती है, जो विचारों और भावनाओं का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण है, ये ऐसे बुद्धिजीवी , रचनाकार हैं जो आज भी दलितों और उनके संघर्ष में जुड़े लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं। इन स्थितियों में दलित रचनाकारों का उत्रदायित्व समाज के प्रति और ज्यादा गहरा हो जाता है क्यों कि गैरदलित साहित्यकार अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता में चाहे जितना प्रगतिशील दिखायी दे,वह वर्तमान समाज के ढाँचे को, धार्मिक विचारधारा, जातिवाद, अछूतों पर अत्याचारों को चुनौती देने में बहुत कमजोर होता है,
ओम प्रकाश वाल्मीक


..और »  
 

लीडर

लीडर बनकर एक मोर्चा हम ले गए
हमेशा की तरह हम आगे,मोर्चा पीछे।

अचानक मोर्चा बिखरा,पुलिस भी बन्दूल ताने
हम संभले, अब मोर्चा आगे हम पीछे।

मौका देखकर वहाँ से हम भागे
ये देख रास्ते के एक चक्के ने हमें गांडू कहा।

*

ढिंढोरा

हर बार वो झोपड़ियाँ तोड़ते गए
हर बार हम बनाते गए

मिटाना उनका शौक
तामीर अपना काम

एक बार ही हमने महलों को तोड़ फेंका
तो इतना ढिंढोरा क्यों?

लोकनाथ यशवन्त

और »  

 

तिल विरह का बाण है जिसको सीधा ताना गया है। तिल अग्निबाण है। उसके एक कटाक्ष में जाख दो लाख जूझ जाते हैं। वह तिल काल स्वरूप है,और उसे मिटाया नहीं जा सकता। कपोल पर उस तिल को देख कर ध्रुव नक्षत्र आकाश में गड़ा रह जाता है।

मंझन कृत "मधुमालती" तिल
के सम्बन्ध में कहा गया है.

तिल जो परा मुख ऊपर आई। बरनि न गा किछु उपमा लाई।
जाइ कुंवर चखु रूप लोभाने । हिलगे बहुरि न आवहिं आनै।।
तिल न होइ रे नैन कै छाया। जासंऊ सोभ रूप मुख पाया।
अति निरमल मुख मुकुर सरीखा। चखु छाया तामहं तिल दीखा।
स्याम कोंवर लोचन पुत्तरी। मुख निरमल पर तिल होई परी।
अति सरूप मुख निरमल मुकुर समान प्रवान।
तामहं चखु कै छाया दीसै तिल होइ होई परी।।

और »

VOL -  II/ PART -IX


 (फरवरी-
2007)

संपादक :  रति सक्सेना


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए