दिलीप चित्रे की कविताएँ

अश्व -पर्व

समुद्र तट पर जंजीर से जकड़ा हुआ
प्राचीन घोड़ा
एक तंग तबेले में
खड़ा भी न रह सकने वाला
उसकी लम्बी मजबूत गरदन
उसकी भव्य कसावट ‌और भरपूर अयाल
उसका तेज-तर्रार शरीर
और घुप्प काला लिंग
पर उदास आँखे
मेरी ही राह देखते
मेरे आते ही मेरे गाल पर,गरदन पर
उसका रगड़ा हुआ मुँह
वह जाना- पहचाना पाशविक दर्प
यह समुद्र की नमकीन गंध

अस्तित्व का इत्र
चट्टान पर थपथपाते थपेड़े में फूट रहा है
थपेड़े मं से निकल रहा है घोड़े के मुँह का फेन
मैं जानी पहचानी ही जगह पर आया हूँ
जैसे कि जिन्दगी में पहली ही बार होश में आनेवाला हूँ

अब बस जंजीर ही तोड़ना है
जिससे समूचा समुद्र घोड़े के आकार में खड़ा हो जायेगा
तंग तबेले से बाहर निकलकर
और अयाल जैसे जिन्दा थपेड़ों में से
निकलेगी झागदार पार्थिवता की सुगंध
अवकाश में टापें उठायें

अपनी ही जड़ों के पास नहीं सा होते जाने वाला मैं
स्वप्न के होश में आऊँगा
समुद्र तट पर
जंजीर तोड़कर
फुरफुराते
अपने थपेड़ों में से।

( दिलीप चित्रे की अन्य कविताएँ )
 


लीलाधर मंडलोई की कविताएँ

उस आदमी पर वार करो

सबसे बीच उपस्थित
दृश्य से बाहर
सबसे खतरनाक
मुजरिम है वह
इस सदी का

समूचे देश को
अपने आरामगाह मे तब्दील करता
हमारे बुजुर्गवारों की
शख्सियत से जोंक की तरह
चिपका है वह

पालतू चीते की भाँति अलसाता
करता है रात गए
अपने नाखूनों को
मृत्यु की अन्तिम सीमा तक तेज

रोज सुबह हमारे घर
आतंक के बीच
ढूँढते हैं दुश्मन के खिलाफ सबूत

अखबार अपनी सुर्खियों में
किसी आदमखोर का
जिक्र करते
हो जाते हैं खामोश

पुलिस तैनात है जंगलों में
और वह रोज रोज
अपनी शक्ल बदलता
निश्चित है अपने आक्रमण में

बुजुर्गवार चुप हैं
और मुर्दनी उनके चेहरो का
अविभाज्य अंग
बनती जा रही है लगातार

सबके बीच उपस्थित
दृश्य से बाहर
सबसे खतरनाक
मुजरिम है वह
इस सदी का

उस आदमी पर वार करो

( लीलाधर मंडलोई की अन्य कविताएँ )


राजेश जोशी की कविता

वृक्षों का प्रार्थना गीतः एक

मत छुओ, हमे मत छुओ बसन्त
अब नहीं हो सकता
छुपम- छुपेया का खेल

तुम छुओ ‌और हम उड़ जाएँ
अन्तरिक्ष में
लुक जाएँ किसी नक्षत्र, किसी ग्रह, उपग्रह
या तारे की आड़ में

हमें डँस लिया है एक विषैली रात ने
मत छुओ, हमे मत छुओ बसन्त


( राजेश जोशी की अन्य कविताएँ )


वीरेन डंगवाल की कविता

चप्पल पर भात

किस्सा यों हुआ
कि खाते समय चप्पल पर भात के कुछ कण
गिर गए थे
जो जल्दबाजी में दिखे नहीं।
फिर तो काफी देर
तलुओं पर उस चिपचिपाहट की ही भेंट
चढ़ी रहीं
तमाम महान चिन्ताएँ।

( वीरेन डंगवाल  की अन्य  कविताएँ)


लाल्टू की कविता

जैसे

जैसे हर क्षण अँधेरा बढ़ता हो
तुम शाम बन
किसी बरामदे पर बालों को फैलाओ
खड़ी क्षितिज के बैंगनी संतरी सी
उतरती उतरती मेरी हथेलियों तक

जैसे मैं कविताएँ ढोता
रास्ते के अन्तिम छोर पर हूँ
अचानक कहीं से तुम
बादल बन उठ बैठो
सुलगती सुलगती अँगड़ाइयाँ बन
मेरी आँखों के अन्दर कहीं।

( लाल्टू की अन्य कवि)
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शीला गुलजार  की कविता

अग्निकाण्

जलती झोपड़ियों से गूंजती आतुर पुकार
निष्क्रीयता की हिम शिला दबे
कवि हृदय की टंकार
मूर्त्त हुई
कविता साकार


( शीला गुलजार अन्य कविताएँ )
 


शैलेश भारतवासी  की कविताएँ

कितना मुश्किल होता है'

कितना मुश्किल होता है
लोगों को यह बताना
कि मैं कमजोर हूँ।
सामने जो पहाड़ है ना
उनकी तरह
मैं नहीं
लाँघ सकता।
सबने बराबर झूठ बोले हैं।।
कितना मुश्किल होता है
पिताजी को यह समझाना
कि बाबूजी
पढ़ते-पढ़ते अब
जी ऊब गया है।
सब ढकोसले हैं।
बड़ी मुश्किल से तो मुझे
यह बात समझ में आयी है
मगर आप नहीं समझ पावोगे।।
कितना मुश्किल होता है
सुब्बो को यह समझाना
कि पगली, 
जिन रेल की पटरियों पर
कभी बिना गिरे
सम्भल सम्भल कर चलना
मुझे अच्छा लगता था।
उन्हीं पर चढ़कर
मुझे दिल्ली जाना पड़ता है।
इन्हीं पटरियों ने बहुतों का घर सूना किया है।।
कितना मुश्किल होता है
भगवान को यह समझाना
कि यह दुनिया
जैसी तुमने बनायी थी
वैसी नहीं बची है।
अब लोगों ने नियम बदल लिये हैं।
अब तुम मत आना
नहीं तो तुम्हारी
पोल खुल जायेगी।
विश्वास नहीं है ना
तो मजबूर का अवतार ले ले
फिर रावण क्या
तू तो लालू से नहीं मिल पायेगा।

(शैलेश भारतवासी की अन्य कविताएँ)


रति सक्सेना की कविता

याद-1

खिड़की बन्द कर दी
दरवाजा पलट दिया
रोशनदानों के कानों में
कपड़ा ठूँस दिया

कोई सूराख ना रहा जिसे
बन्द ना किया गया
न जाने कब और कैसे
याद से घर भर गया

याद-2

पहली याद आई
तिनका धर चली गई
दूसरी ने तिनकों पर
सजा दिए तिनके
घौंसला चहचहा उठा

याद-3

मानसून का रुख बदला
हवा सूख कर चिमट गई
थम गईं साँसे
बादल टकरा उठे फैंफड़ों से

फरफराती कुछ बून्दे
नाचती पत्तियों पे
बरसात क्या आई
यादें बरस गईं

(रति सक्सेना की अन्य कविताएँ)


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