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दिलीप
चित्रे मराठी के वरिष्ठ ख्याति प्राप्त कवि हैं, आपकी
कविता की संवेदना एक विशिष्ट स्तर का स्पर्श करती है। आपकी कविताओं
का अनुवाद देश- विदेश की अनेक भाषाओं में हुआ है। प्रस्तुत कविताओं
का अनुवाद हिन्दी के वरिष्ठ कवि चन्द्रकान्त देवताले ने किया है,
जिनकी कविताओं का आस्वादन कृत्या के पाठक ले चुके हैं। निसन्देह
चित्रे जी की कविताएँ हिन्दी में भी मूल कविता सा आस्वादन दे रहीं
हैं।
आजी की मृत्यु
मेरी आजी मर गई, एक नाटी दुबली औरत
इक्यासी वर्षों की
अब पलंग पर पड़ी है
गर्मियाँ है। उसके सिर के इर्द-गिर्द मक्खियाँ मंडरा रही हैं।
मेरी आजी इतनी मनुष्य लग रही है कि डर लगता है
सूतक मनाने वाले अमानुषों की भीड़ में
जो भावुकता फैलाते हैं
अविश्वसनीय, अफवाहों-सी
मैं देखता हूँ उसके चेहरे की ओर। उसका मुँह
थोड़ा- सा खुला है अपने टूटे दाँत दिखला रही है वह
उसकी आँखे खुलने को ही थीं, मैं देखता हूँ
बाहर हवा पर धूप में से
एक चिड़िया उड़ जाती है। भुलक्कड़
एक बूढ़ी और निश्चल औरत देखकर
मेरा दम घुटता है मुझे शह लगती है
वह प्राचीन है और निर्माल्यवत् बनी जा रही है
कुछ ही देर में उसे सुला देंगे चिता पर
कुछ ही देर में हम लकड़ियाँ सुलगा देंगे
गर्मियाँ हैं। वह भर्र से जल जायेगी
परत-दर-परत नहीं सी हो जायेगी मेरी आजी
लकड़ी के पटिये पर से वह उड़ेगी आग में
वह गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर- ऊपर जायेगी गोता लगाकर
वह नियमानुसार गहरे डूबती जायेगी
आजी ने छोड़ दिया है घर
अब वह हो गयी सभी चीजों की समकालीन।
चिड़िया जैसी भुलक्कड़ बनेगी।
मक्खी भिनभिनाती रहेगी उस तकिये के इर्दगिर्द
जहाँ टिकाया था उसने अपना सिर।
मेरी आजी जो मरी है।
क्या यही है आजी? टूटे दाँतों का सूर्यास्त
और झुर्रीदार हवा
और मैं ठसाठस बैठा हुआ बेढ़ब आरामकुर्सी पर।
गंजी टेकरी
आपने जमीन बेचनेके लिए प्लाट कटवा कर
मेरे बचपन से शुरु होनेवाला बड़ कटवा दिया
कुल्हाड़े वाले मजदूर लगाकर, गूलर कटवा दिया
नीम, अनार, सहजन, पारिजात, कटवा दिया
फिर मुझे भेज दिया शहर पढ़ने के लिए

आजू - बाजू के घर पहले ही गिरवा दिये थे
पाँच-पच्चीस बसे हुए घरों को हटाकर
फिर संस्कृति -खातिर बलिदान करने के हठ से
हम सबों के जन्म के इर्दगिर्द की झाड़ी को तोड़कर
स्मृति में रख दी एक गंजी टेकरी
मैं पलटकर- भटकता रहा तो क्या हुआ
खोजता रहा मैं ही जड़ें और शाखाएँ दुनिया-भर
मुझे चाहिये था अपने इर्द-गिर्द घना जंगल
और रिश्ते, कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षियों और इंसानो से
एक गंजी टेकरी -जैसे समाज में मैं कवि हो गया।
सिलाई
मन प्राणों की सुई
एकाग्र सफाई से लगाती
जनम-जनम का टाँका
मौन कपड़ा, शान्त धागा
मेरे सब कुछ की सिलाई
चुस्त बुनाई
जैसे हथेली में हथेली
हँसी में
रहस्य
चमक गए दाँत
जैसे रचना
अब सुई की आँख में
पिरोया
आशीर्वाद का झरना
समस्त स्तब्ध
फैलाव
एकटक
पीठ किए।
क्या मेरा वक्त आ गया है
क्या मेरा वक्त आ गया है
यहाँ घड़ी नहीं है न है कोई कलेण्डर
पर जानता हूँ
कि पहुँच गया हूँ
पागलपन की स्तब्ध नोक पर
आईने ही दीवारे हैं कफन
कफन ही कैप्सूलें
अवकाश में तैरने वाली
क्या मेरा वक्त आ गया?
मैं हो रहा हूँ वहशी
निर्विकारता में धुँधआता
किसी संत-सा
अपनी ही आँखें उखाड़ता
अंधे आनन्द में नाचता
नापता कुद्ध फासले
मेरे और अपने बीच
करता
अपनी ही शव-चिकित्सा
अपनी ही अँतड़ियों और भेजे के द्रव्य
अपनी ही अस्तित्व के जोड़ और तुरवाई की--
चमड़े के बटुए की जिसमें
सुरक्षित रक्खा था मैंने ब्रह्माण्ड
क्या मेरा वक्त आ चुका है?
इस चीख के भीतर है
एक फैलती हुई खामोशी
स्मतिविहीन मुस्कान
वैश्विक पागलखाने की खिड़कियों के बाहर
झाँकते शब्दों की
पहियेवाली कुर्सी के
चक्करदार वक्तव्य
पिघल रहे हैं धूप में
स्वर्ग के अस्तपताल में हैं
आनन्द के ढलान
मैं पहले से ही फिसल रहा हूँ
ढलानों पर
क्या मेरा वक्त आ चुका है? |