शैलेश भारतवासी  की कविताएँ


पापी कौन ?

मुझे यह तो याद नहीं
पहली बार यक्ष ने
कब घेरा था
और क्या पूछा था
पर जो भी
पूछा था
उसका उत्तर नहीं था मेरे पास।
अब जब से
अकेला हो गया हूँ
अक्सर खड़ा हो जाता है सामने
और नंगा कर देता है।
कई बार उसके डर से
कमरे का बल्ब भी बुझाया है
पता नहीं कहाँ से
नाइट-बल्ब की तरह टिमटिमा जाता है!
आते ही
सवालों की रोशनी फेकने लगेगा।
बार-बार चादर से
जिस्म को अंधेरे में ले जाता हूँ।
पर ज़मीर को ये मंजूर नहीं
उसको घुटन होती है
बंद हवाओं में
कहता है-
तड़पने दो मुझे
बचपन पॉलीथीन बीन रहा है
जिम्मेदारी कौन लेगा?
माँ और बहनें छली जा रही हैं
सुरक्षा कौन करेगा?
दुश्मन सेंध लगा रहा है
रखवाली कौन करेगा?
बहूयें जल रही हैं
अग्निशमक कौन बनेगा?
भाई आतंकवादी हो गया
दोषी कौन?
बाहुबली सीना फाड़ते हैं
अपराधी कौन?
नेता देश बेच रहे हैं
पापी कौन?

वक्त लगेगा

जो संवेदनायें मुझसे उठ कर गयी हैं
उन्हें तुझसे परावर्तित होकर
लौटने में वक्त लगेगा।
जो महक अपने मन की भेजी है
उसे तुम्हारी जिस्मानी खुश्बूँ को
उड़ा लाने में वक्त लगेगा।
जिस मोरनी की चाल को
जंगल से चुराकर भेजी है
उसे तुम्हारी मस्तानी चाल से
मात खाने में वक्त लगेगा।
जिस आइने को गोरी से
माँगकर भेजा है
उसे तुम्हारा
रूप चुराने में वक्त लगेगा।
ममता जो कुछ बोलती ही नहीं
मौन में विश्वास है जिसका
तुमसे मिलना उसका और
चिल्लाने में वक्त लगेगा।

अभीष्ट के दर्शन

कैसे वंचित रख सकता है
कोई अपने आप को
इस वरदान से!
क्या उसके धमनियों में
रक्त का संचार नहीं!
अंधेरे में था मैं
सुनी-सुनायी बातों पर
भरोसा करता रहा।
बस एक शीतल स्पर्श ने
पूरा अंतस झूठ ला दिया
अब तक झूठ मंदिरों में
जाता रहा,
खोजता रहा था
अपना अभीष्ट,
पर वह मृग-मरीचिका थी।
मुर्दों की आँखों में
अपने कष्टों की
अभिव्यक्ति देखना चाह रहा था
शवों के ह्रदय में
मधुर-मिलन की
तड़प देखना चाह रहा था।
पर कितना सौभाग्यशाली था मैं!
जीवंत देवी के दर्शन हो गये।
जिस मार्ग पर दौड़ रहा था
उसमें था मात्र हाहाकार
चहुँओर फैला था
अतृप्त तृष्णा का विस्तार।
परन्तु अचानक
अमृत के दर्शन हो गये
रोम-रोम आवेगित हो उठा।
अब मैं
श्रद्धालु से पुजारी बनना चाहता हूँ,
अमर-मुर्ति का वंदन करना चाहता हूँ।
उसके स्पर्श की सुगंध
अभी तक साँसों में अध्यारोपित है,
विज्ञापन-चित्र की भाँति
सुयोग चिन्ह नैनों में समाहित है।
होश आ गया है मुझे
समझ गया हूँ मैं
स्त्री-सुख ही अभीष्ट सुख है।
 


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