मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 

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एक युवा कवि कुलदीप ने कविता पढ़ते- पढ़ते शहादत दे दी। वे लम्बे वक्त से अनशन पर थे। अनशन का सम्बन्ध व्यक्तिगत लाभ नहीं,बल्कि सामाजिक भावना थी, जिसे सरकार जानबूझ कर नकार रही थी। खबर सुन कर मेरे मन में मिली- जुले विचार घमासान मचाने लगे। क्या आज के व्यापारीकरण करण के दौर में कोई कवि सामाजिक भावना के तहत शहादत दे सकता है? क्या इस तरह की शहादत समाज के लिए कोई अर्थ रखती है? यही नहीं, क्या आज कोई शहादत का अर्थ जानता है? या फिर कविता का ही?
आज जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, भावनाओं का कोई महत्व रहा है?
दूसरे क्षण मुझे अजीब सी खुशी हुई कि कविता पढ़ते हुए मरना, कितनी खूबसूरत मौत है ना? अनेक घिसती रगड़ती मौतों को देखने के बाद कविता के साथ मृत्यु मुझे व्यामोहित सी कर रही है, लेकिन तुरन्त अपने को इस छद्म रोमान्टिज्म से अलग करते हुए मैंने अपना ध्यान दूसरी बातों की ओर केन्द्रित किया।

रति सक्सेना
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यह देखा कवि
शब्द भण्डार की पहाड़ी पर चढ़ता हुआ
पनिहारिन की तरह सन्तुलन बनाता हुआ
शार्टर आक्सफोर्ड डिक्शनरी के
दो पूरे अंकों के बीचों-बीच
जेरि मर्फि (Gerry Murohy)

*
माँ दुख-सुख को
भूख- दुख कहती है
सुख को काट देती है
यूँ ही नही
सुरेन्द्र प्रबुद्ध

*
उसकी आँखों में जो
चमक थी
क्या कहूँ
सितारा या स्वप्न
एक तरफ आकाश
जिसकी परिधि रंगी
स्वर्ण वर्ण से
चिड़िया चाहती बनाना
घोंसला
हिरण जहाँ विश्राम को लालायित
और भटक रहा था मैं
शरणागति के लिए।

अमित कल्ला

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कविता का सृजन कुल मिला के सौंन्दर्य भाव को ही मूर्त करना है। यह भाव मनुष्य, प्रकृति और समाज की गतिकी से जुड़ा होता है। किसी कविता को परखने के लिए हम सौन्दर्य बोध की चर्चा करते हैं। आज हम कविता में जैसा सौन्दर्य बाव पहचानते हैं, क्या ऐसा पहले था या हमारी इन्द्रियाँ, मन और विवेक के साथ इसका विकास हुआ है। कवि के आँखों से देखी दुनिया मन में सौंन्दर्य का बाव जगाती है। वह हमें ?अपनी ओर खींचती भी हैं। हम उसे चाहते हैं। पसन्द करते हैं। वस्तु के सौन्दर्य को देखकर हमारे मन में सौन्दर्य का भाव जगता है। तो ध्यान दें कि वस्तु प्राथमिक है। क्या ऐसा भाव दार्शनिक, जीव वैज्ञानिक और पुरातत्वविद के मन मे भी जगता होगा? यदि जगता होगा तो शायद वे सौन्दर्यभाव की व्याख्या दूसरी तरह से करेंगे। बहुत बड़े वैज्ञानिक ने माना है कि सौन्दर्य भाव सिर्फ मनुष्यों में ही नहीं होता हैं। ..
विजेन्द्र
(कृति ओर से साभार

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वह उन चुकुन्दरों के बारे में बताती है
जो उसने जर्मनी में खोदे थे, बेहिसाब, गुलाब से
ज्यादा लाल, बर्फ से पहले जमीनं में गड़े
आदमी के दिल और गुर्दे से भी ज्यादा लाल

उसे उस पहले चुकुन्दर की याद है, जब वह
खेत में अकेली थी, माँ पिता करीब नहीं थे
न ही बहन, वे सब मर चुके थे
*
मेरी माँ ने सीखा कि सैक्स बुरा होता है
आदमी बेकार, और हमेशा ठण्ड रहती है
खाने के लिए कभी भी पूरा नहीं पड़ता

उसने सीखा कि यदि तुम्हारा हाथ बेकार हैं तो
तु कभी बच नहीं सकते, पतझड़ में बच गए तो
सर्दी में हरगिज नहीं

उसने सीखा कि कैम्प में बस युवा
बच सकते हैं, बूढ़े बेकार रद्दी की तरह
ढेर में पड़े रहते हैं, और बच्चे चिकन और
ब्रेड की तरह काफी कम होते हैं।
John Z. Guzlowski

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ओशीकोची नो मित्सुने
( -----925)

यदि मेरी इच्छा होती
श्वेत गुलदावदी तोड़ने की
तुषार से भ्रमित हो
कहीं पतझड़ के प्रारम्भ काल में
मैं अकस्मात वह फूल तोड़ न लूँ।

***

तायरा नो कानेमोरी

(---990)

चाहे मैं उसे छुपाता है
मेरे चेहरे पर फिर प्रकट हो जाता है
मेरा अनुरक्त, गुप्त प्रेम।
और अब वह मुझसे पूछता है
" क्या तुम्हें कुछ परेशान कर रहा है?"

***

मुरासाकी शिकिबु

पथ पर मिलकर
मैं स्पष्ट नहीं समझ पाई
क्या वह ही था,
क्यों कि अर्धरात्रि का चन्द्रमा
बादलों में अदृश्य हो गया।

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VOL - IV/ PART III

(अगस्त- 2008 )

संपादक :  रति सक्सेना


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