|

दुष्यन्त युवा कवि कथाकार हैं, एक कविता संग्रह 2005 में प्रकाशित,
पहली कहानी पिछले दिनों परिकथा में
प्रकाशित हुई, टीवी, रेडियो और फिल्मों के लिये खूब
लिखा है। वे त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका शब्दक्रम के
संस्थापक संपादक रहे हैं, इतिहास में
पीएचडी हैं पर पेशे से पत्रकार हैं, इन दिनों जयपुर में डेली न्यूज
अखबार की संडे मेगजीन के प्रभारी हैं।
संपर्क -43-17-5, स्वर्णपथ, मानसरोवर, जयपुर,
मो-91-9829083476
ई-मेल-
dr.dushyant@gmail.com
सपना-दो
एक सपने की
मृत्यु हो गयी
आंसुओं का महल बन गया
मिट्टी का घर
किसी के अहम् की ठोकर से
चूर हो गया
सपना -तीन
सपना होता है आधी हकीकत
और पूरी हकीकत के ठीक बीच
जैसे त्रिशंकु स्वर्ग
धरती और आकाश
के ठीक बीच
सपना पूरी तरह झूठ नहीं होता

सपना - चार
गरीब का सपना
तो अकाल के दिनों में
पेट भर कर रोटी खाने सा होता है
जिस के पंख तो होते हैं
पर वो होते हैं
ठीक कागज़ की नाव की तरह
अनुवाद -स्वयं कवि द्वारा
|