मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 

 

 

 

 

      www.kritya.org

 

कोउ नृप हो हमे का हानि, मंथरा की यह उक्ति वर्षों से नारी मन की नासमझी का बयान मानी जाती रही है। पिछले दिनों देश भर में चुनाव के नतीजे आये, नई सरकारें आई, पुरानी टूटी...
लेकिन यह सन्देह जनता के मन से दूर नहीं हुआ कि नई सरकार पुरानी से भी ज्यादा बेकाम तो नहीं है?

केरल जैसे प्रदेश में, जहाँ आम आदमी को हर चुनाव के साथ बदलती सरकार देखने को मिलती है, लोग ना ज्यादा उत्साहित दिखते हैं, ना ही कुछ नए की आशा करते।

कवि कहता है..

राजा समन्दर में / पहाड़ उतरवा सकता है, / और मथवा सकता है उसको. /देवताओं और दानवों दोनों से... (सुलतान अहमद)

जनता ना तो देवता है. ना ही दानव, इसलिए इस मंथन में मिलने वाले अमृत पर भी उसका अधिकार नहीं.... फिर तो वह यही सोचेगी ना, कोउ नृप हो हमे का हानि?

लेकिन क्या यह पूर्णतया सम्भव है कि जनता की कोई आवाज हो ही ना हो?यदि ऐसा होता तो दुनिया भर की इतनी क्रान्तियाँ खामोश न गुजर जातीं?

यदि ऐसा होता तो आज जो क्रान्तियाँ यमन आदि देशों में पसरी हुईं हैं, जनता की आवाज ना होतीं।

होता ऐसा भी है कि जनता क्रान्तियाँ करती है, और राजा उसका लाभ उठाते हैं,
रति सक्सेना

और »

 

 

दिन ने नदी को
नदी ने दिन को
प्यार किया।

दोनों ने
एक दूसरे को जिया
एक दूसरे को
जी भर कर पिया।
आदमी ने
दिन को काटा
नदी के पानी को बाँटा।
केदारनाथ अग्रवाल
*
सर्द रेत के कागज पर
दस्तखत करता है
पीले ख्वाबों के
लेकिन रेत की आँधी
पीले दस्तखत पर
कब्रे चुनती रहती हैं
हिज को बुनती रहती हैं
सकूर खाँ की सारंगी पर
जोगिया छेड़ती रहती है
जयंत परमार
*
मामूली सा नमक
जो आदमी के सुख का स्वाद बढ़ा देता है
आदमी को अन्दर से मजबूत बनाता है
चेहरे पर सच की कांति उपजाता है
और सबसे बढ़कर
आदमी को भरोसे की चीज बनाता है
मार्फत इस कविता
आपको बता दूँ
इस समय की ब्रेकिंग न्यूज यह है
" आदमी में घट रहा है नमक"
प्रदीप जिलवाने

*

पहाड़ उतरवा सकता है,और मथवा सकता है उसको
देवताओं और दानवों दोनों से
बाढ़ पर आयी हुई नदियों पर
बाँध बँधवा सकता है
उपजाऊ बनवा सकता है रेगिस्तान को
तिलस्मी हथियार चलवाकर
हमेशा हमेशा के लिए
कोढ़ी बनवा सकता है किसी गुलिस्तान को

सुलतान अहमद
और »

 
अब हम समकालीन स्त्री कविता की वर्तमान स्थिति के बारे में चिन्तन करें कई सवाल खड़े होते हैं...
१- साहित्य में विशेषत कविता के क्षेत्र में पुरुष लेखन की अपेक्षा स्त्री लेखन की मात्रा अपेक्षाकृत कम क्यों है? क्या यह स्थिति प्रत्येक भाषा साहित्य में है? या फिर मात्र हिन्दी साहित्य ही इस मनोग्रन्थि का शिकार है?
२-प्राप्य स्त्री लेखन पुरुष और स्त्रीलेखन में वास्तविक विरोधभास है या मात्र मनोकल्पित?
३- क्या स्त्री विषयक लेखन या स्त्री लेखन में स्त्री की आत्मसत्ता को पर्याप्त स्थान मिला है अथवा यहाँ भी पुरुष मनोग्रन्थि हावी रही है?
४-क्या स्वतन्त्रता के इतने वर्षोपरान्त भी स्त्री मानसिक रूप से स्वतन्त्र हुई है? विशेषत साहित्य के क्षेत्र में?
५-क्या ऐसी एक भी रचना है जिसमें स्त्री को पुरुष के सहारे के बिना उसकी अपनी सत्ता में स्वीकारा गया हो? या फिर क्या कोई स्त्री लेखन पुरुष सहयोग के बिना स्थापित हो पाया है?विशेषत कविता के क्षेत्र में?
६- क्या स्त्री लेखन का पाठ पुरुषपाठक के लिए दुरुह है? क्या पुरुष पाठक स्त्री लेखन को उस तरह नहीं पढ़ सकते जैसे सदियों से स्त्रियाँ पुरुष लेखन का पाठ करती रहीं हैं?
समकालीन हिन्दी कविता में स्त्री लेखन और सतह पर तैरते चन्द सवाल
  ....और »  
 

मैं अकेला हो रहा हूँ
काँधे पर बैठे पावस पंछी का
थरथराता गीत थम रहा है
किसी ग्रामविधवा जैसे
पत्तियों से सिर ढके हवा कृश चल रही है
स्वच्छाकाश में चिड़ियों के झुण्ड छोड़
कनेर प्रत्यंचा कंपकँपा रही है
पतली सी धार बन खामोशी सूख रही है
मैं अकेला हो रहा हूँ

मैं अकेला हो रहा हूँ
गलियों में फेंक रहे हैं खून और उदासी
छोटी सी गेंद जैसे मुझे
मदमोह, कामपीड़ित, क्षुधार्थी
भटक रहे हैं रोगी जन
कोई चार चक्र पर, कोई दो पर, तो कोई पैदल
यह स्पताल का रास्ता
इंतजार साथी का, सहाय का, भाग्य का, मौत का
सिर पटकते,गाली गलोच करते
मछली का मोलतोल, जिन्दगी का मोलतोल
देश का भी मोलभाव करनेवाले
शवगाड़ी पर जैसे मक्खियों से भिनकते चेहरे
जड़ हो पुन धड़कते सपने
एक छोटे से तिनके की छाया तक नहीं, फूल नहीं
पंछी नहीं, पंछी कलरव नहीं
बस नेता गरज रहा है सुबह के बारे में
रण भूमि के बारे में
भक्ष्य पर चक्कर लगाती चीलों जैसे
वे मंडराते हैं शब्दों पर
व्यर्थ है यह धिकार मोही का प्रलाप
बड़बड़ा रहा है
के सद्चिदानन्दन
और »  

 
मौन शान्त महेन्द्राचल शिखर पर
बैठ एकाकी देख रहा मैं दूर
हवा, रोशनी और ध्वनियाँ
तलवे सहलाती बहती धरा ओर
निज नित्य पीठ तले बहतीं
श्र्वेत मृदुल फेनिल सागर लहरें

आतुर दृष्टि दौड़ रही चहुँ ओर
नील गगन के तले
कदलीपत्र से बिछे देश देखने
निज इच्छा और ज्ञान शक्ति से
फलित हुआ मुनिपुत्र स्वप्न
वहाँ फैल रहीं नवधान्य सुगन्धि
वहाँ उत्सव मनाती प्रकृति
वहाँ उभरती क्रीडाविनोद ध्वनि
वहाँ नाचते जन मग्नमग्न
किलक रहा है मेरा देश
उत्साह मग्न जनवासी
याद नहीं उन्हें मेरी
याद नहीं काँधे के परशु की

सृष्टि के आदिम युग में
भीमाकार जीव बसा करते थे
आकाश. भूमि और सागर में
पापमुक्त मानव की चरण वन्दना हेतु
देवगण उतरउतर आते विस्तृत कानन में
आत्म समिधा ज्वलन से सुगन्धित जनपद
धीर गंभीर शान्त वातावरण
व्रतनिष्ठ जमदग्नि के प्रियपुत्र रूप मैं
लालितपलित हुआकानन कुटज में
ब्रह्मऋषि पिता से आराधन शक्ति
आश्रम द्रुमदल की शीतल छाया में ध्यान मग्न मुझे
धरा सकल में प्रतीति होती सुखद छाया की ...
बालामणियम्मा

 और »

VOL - VI/ ISSUE-XII
(जून- 2011
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए