केदारनाथ अग्रवाल की कुछ कविताएँ

दिन नदी और आदमी


दिन ने नदी को
नदी ने दिन को
प्यार किया।

दोनों ने
एक दूसरे को जिया
एक दूसरे को
जी भर कर पिया।
आदमी ने
दिन को काटा
नदी के पानी को बाँटा।


(केदारनाथ अग्रवाल की अन्य कविताएँ )


भरत तिवारी


एक...

इस शब्द में ही गडबड़ी है

ना जाने किसने सृजन किया

शब्दों की जन्म कुण्डली तो अब बनायीं जाती है

फलां शब्द किसने कब और क्यों कहाँ

और बाकी के ना जाने क्या क्या ब्योरे

‘इन्तेजार’ शब्द की बात कर रहा हूँ

जब से पैदा हुआ होगा

किसी को नहीं बक्शा

सृष्टि के बाद भी ये नहीं जायेगा...

 

(भरत तिवारी की अन्य कविताएँ ) 


जयंत परमार की कविता


जेसलमेर



दूर दूर तक

रेत समन्दर
रेत के पीले हाथों में
पीतल के सूरज का तमगा
ऊँट की गरदन जैसे टीले पर
लड़की के गालों पे
हल्दी मलती पीली पीली शाम।



इन्जल पर

है रेत का कैन्वस
इन्तिजार करता है कि कब कोई आए
और पाँवों के ब्रुश से
इक तस्वीर बनाये।



जेसलमेर

सर्द रेत के कागज पर
दस्तखत करता है
पीले ख्वाबों के
लेकिन रेत की आँधी
पीले दस्तखत पर
कब्रे चुनती रहती हैं
हिज को बुनती रहती हैं
सकूर खाँ की सारंगी पर
जोगिया छेड़ती रहती है



पीली रेत सहारा में

जाने किसके नक्शे पाको
ढूंढ़ रहे हैं
एक पाँव खड़े हुए
जर्द दरख्तों ले साये



सालम सिंह की

नकसीदार हवेली जैसा
कथई ऊँट
पीठ पे अपनी किला उठाकर
पीली रेत के दरिया में
दौड़ता रहता है दिन भर

शाम होते ही
किले के साये में बैठा
जुगाली करता रहता है
चबा रहा है लगाम अपने माजी की
और नथनों से थूकता रहता है गुस्सा!

६ दूर दूर तक

रेत के पीले कागज पर
घास, फूस, गोबर मिट्टी के कच्चे घर
घर के दरवाजों पर चलते हाथी मोर
ऊँट के चमड़े की जूती से
सारा आँगन करता थोर



गुजरात के उर्दू कवि जयन्त परिमार की हिन्दी कविताएँ

वसुधा से साभार


प्रदीप जिलवाने

नमक

मामूली सा नमक
जो आदमी के सुख का स्वाद बढ़ा देता है
आदमी को अन्दर से मजबूत बनाता है
चेहरे पर सच की कांति उपजाता है
और सबसे बढ़कर
आदमी को भरोसे की चीज बनाता है
मार्फत इस कविता
आपको बता दूँ
इस समय की ब्रेकिंग न्यूज यह है
" आदमी में घट रहा है नमक"

इस बाजार के उपभोक्तावादी युग में
इस पूंजी प्रभुता के दौर में
इस नितान्त व्यावसायुक सोच समय में
नमक
अब महज एक किचन प्रडेक्ट भर
होकर रह गया है जिसमें
"आयोडिन" भी जरूरी है

इतिहास के मलबे में
कई किस्से हैं
जब मामूली से इस नमक को
आदमी ने अपने रक्त से तौला था
रणभूमियों में रक्त नहीं, नमक ही बोला था

नमक ने ही लिखे और
लिखवाये कई ग्रन्थ
नमक गाता रहा
सदियों तक एक ही गीत
लगाता रहा एक ही नारा
क्यों कि
नमक भी कर्ज की तरह

पिता से पुत्र के हिस्से आता रहा
पीढ़ी दर पीढ़ी

मामूली से नमक की कीमत रही
सबसे ज्यादा
सच्चे प्रेम से भी ज्यादा
हर पवित्र नाते से भी ज्यादा

वसुधा से साभार


( प्रदीप जिलवाने की अन्य कविताएँ)


सुलतान अहमद

 

राजा से ज्यादा खतरनाक

राजा समन्दर में
पहाड़ उतरवा सकता है
और मथवा सकता है उसको
देवताओं और दानवों दोनों से
बाढ़ पर आयी हुई नदियों पर
बाँध बँधवा सकता है
उपजाऊ बनवा सकता है रेगिस्तान को
तिलस्मी हथियार चलवाकर
हमेशा हमेशा के लिए
कोढ़ी बनवा सकता है किसी गुलिस्तान को

राजा बड़ा है
कर सकता है सिर्फ बड़े बड़े काम ही

राजा से नहीं हो सकता
इतना छोटा काम कि वो
किसी गरीब के गंधाते बच्चे को
अपनी गोद में उठा ले
बिना किसी कपट के
और गालों पर
अपने होंठों के निशान बना दे

कुछ लोग कहेंगे
वो ऐसा कर सकता है

आप यकीन करे या न करे
राजा से ज्यादा खतरनाक है वो

वसुधा से साभार

(सुलतान अहमद अन्य कविता)


राघवन अत्तोऴी मलयालम दलित कवि की कविता


कण्डति

गली में कूड़े के ढेर पर
गन्दे लूगड़ों में
जलती भूख से
पसीना पसीना हुई वह,
रात के ब्यालू को
कुछ चीजें समेटे
बुझे दिये वाली कोठरी में
अकेली बैठी वह,
दिन की सफेदी खींचते
कालिख छोड़ते
सूरज को सरापती
दिशाओं के चेहरे करिया जाने तक
ठहराई मजूरी के बदले
घास खोदती वह ।


पत्थर कूटकूट कर
हाथ बटाती वह
बीज बिखेर
आँसुओं से सींचती वह,
जुए से जुते बैलों से
खिंची गाड़ियाँ
हाँफते सिसकते जनम
आवारा भटकते बच्चे
मरे गोत्र
कुचले लक्ष्य ;
खिले लहराते खेतों में
उगे नाज से
भरता किसी और का भण्डार ,
अधभरे पेट पर
कसी लंगोटी बाँधे
कमर झुकी बुढ़िया सी
झुकी रहती वह
खेत के किनारे
भूख से बिलबिलाते
बच्चे के चेहरे को धोती
आँसू बहाती वह ।


आधे निमिष को
स्तनपान कर
आँसुओं को
पसीने में बदलती वह,
निषेध सूक्तों को
लगातार उलीच
कविता रच सजाती वह,
नारियल के रेशों सी
बिखरी बिखरी ज़िन्दगी
कुचले खोपरे सी
फैली जीर्णताएँ ।


भीड़ भड़क्कर में
मन्डराती भीख मांगती
भीख में मिले नाज सी
कुचली वह
प्यास से जब गला तड़कता
तो छुआछात की राक्षस लीला में
फटे फूटे कण्ठ वाली वह
वही है मेंरी जन्मदात्री
उसे चाहिये रोशनी
जो बुझ गई
और गरमागरम तेल,
इसे चाहिए नहीं कपड़े
जो पाप में डूबे हों
इसे तो चाहिए बस
मुट्‌ठी भर रेत
जिसमें पाप के दाग न हों
ज़रा सा धान
जिसमें खून के दाग न हो,
यही है मेरी
जन्मदात्री माँ । ।........


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